रामपुर। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री आजम खान से जुड़े जौहर यूनिवर्सिटी और मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट की मुश्किलें लगातार बढ़ती नजर आ रही हैं। प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने कथित मनी लॉन्ड्रिंग और यूनिवर्सिटी के निर्माण व फंडिंग से जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच तेज कर दी है। हालिया कार्रवाई में जांच का दायरा अब ट्रस्ट के पदाधिकारियों, दानदाताओं और उनसे जुड़े वित्तीय लेनदेन तक पहुंचता दिखाई दे रहा है।
दान देने वालों की भी होगी जांच, कहां से आया पैसा?
जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू जौहर ट्रस्ट को दिए गए कथित बड़े दान से जुड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक ईडी ने ट्रस्ट में दान के नाम पर रकम जमा करने वाली कई फर्मों और संस्थाओं का रिकॉर्ड अपने कब्जे में लिया है। अगस्त में हुई तलाशी के दौरान 11 ऐसी फर्मों का विवरण भी जांच एजेंसी के हाथ लगा, जिन्होंने ट्रस्ट को चंदे के नाम पर रकम दी थी। अब जांच का मुख्य सवाल यह है कि इन संस्थाओं के पास वह पैसा कहां से आया और ट्रस्ट तक पहुंचने से पहले तथा बाद में उसका वास्तविक इस्तेमाल कैसे हुआ।
यानी जांच केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि ट्रस्ट को कितना पैसा मिला, बल्कि यह भी देखा जा रहा है कि पैसे का स्रोत क्या था, दान देने वाली संस्थाओं की वास्तविक गतिविधियां क्या थीं और उनके वित्तीय रिकॉर्ड ट्रस्ट के रिकॉर्ड से मेल खाते हैं या नहीं।
आयकर जांच में भी सामने आए थे दानदाताओं को लेकर सवाल
इस मामले में आयकर विभाग की जांच रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण है। रिपोर्टों के अनुसार जौहर ट्रस्ट ने जिन लोगों और संस्थाओं से दान मिलने की जानकारी दी थी, उनमें से कुछ के बारे में जांच अधिकारियों को पर्याप्त जानकारी या उनका पता लगाने में कठिनाई हुई। इसके अलावा जांच में ट्रस्ट के संचालन और यूनिवर्सिटी निर्माण की लागत को लेकर भी सवाल उठे थे। रिपोर्ट के अनुसार आयकर जांच में कुछ ऐसे लोगों का भी उल्लेख है जिन्हें नाममात्र का ट्रस्टी बताया गया। एक व्यक्ति ने जांच में खुद को ‘डमी ट्रस्टी’ बताए जाने संबंधी बयान दिया था। हालांकि, ऐसे बयानों और जांच निष्कर्षों को संबंधित जांच एजेंसियों के रिकॉर्ड और अंतिम कानूनी निष्कर्षों के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।
494 करोड़ रुपये के खर्च का हिसाब भी जांच के केंद्र में
जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण और उससे जुड़ी परिसंपत्तियों पर खर्च की रकम भी जांच का अहम हिस्सा है। रिपोर्टों में आयकर जांच के हवाले से बताया गया है कि ट्रस्ट की ओर से भवन निर्माण की लागत लगभग 46 करोड़ रुपये बताई गई थी, जबकि अधिकारियों के सर्वे में लागत इससे काफी अधिक आंकी गई। एक रिपोर्ट में यह आंकड़ा 450 करोड़ रुपये से अधिक बताया गया है।
वहीं, ईडी की अगस्त की कार्रवाई के दौरान यूनिवर्सिटी निर्माण और अन्य खर्चों से जुड़े दस्तावेज खंगाले गए। कुछ रिपोर्टों में लगभग 494 करोड़ रुपये के खर्च और उसके स्रोत से जुड़े सवालों का उल्लेख किया गया है। इन आंकड़ों को अलग-अलग जांच प्रक्रियाओं और आकलनों के संदर्भ में समझना जरूरी है; इन्हें अपने आप में किसी अपराध का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
सरकारी ठेकों के पैसे के इस्तेमाल का भी आरोप
जांच में सरकारी ठेकों से जुड़े पैसों को यूनिवर्सिटी के निर्माण में इस्तेमाल किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। आयकर जांच की रिपोर्टों के अनुसार कुछ ठेकेदारों ने सरकारी परियोजनाओं के लिए मिली रकम का एक हिस्सा जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण में लगाने की बात कही थी। एक रिपोर्ट में जौहर एसोसिएट्स और सीके एसोसिएट्स से जुड़े करीब 86 करोड़ रुपये के सरकारी फंड के कथित दुरुपयोग का उल्लेख किया गया है। ईडी की जांच भी कथित तौर पर सरकारी कॉन्ट्रैक्ट से मिले फंड को निजी ठेकेदारों के माध्यम से दूसरी जगह इस्तेमाल किए जाने और फिर ट्रस्ट/यूनिवर्सिटी से जुड़े निर्माण कार्यों में लगाए जाने की कड़ियों की पड़ताल कर रही है।
कुलपति से आठ घंटे पूछताछ, ट्रस्टियों को भी नोटिस
मामले में जांच की ताजा कड़ी के तौर पर 26 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक ईडी ने जौहर यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. जहीरूद्दीन से करीब आठ घंटे पूछताछ की। उनसे ट्रस्ट में उनकी भूमिका, कुलपति नियुक्ति की प्रक्रिया, यूनिवर्सिटी परिसर में बने भवनों और सरकारी विभागों की रकम से जुड़े सवाल पूछे गए।
इसके अलावा ईडी ने जौहर ट्रस्ट के सभी ट्रस्टियों को भी पूछताछ के लिए नोटिस जारी किया है। इससे संकेत मिलता है कि जांच एजेंसी अब ट्रस्ट के संचालन और वित्तीय नेटवर्क को विस्तार से समझने की कोशिश कर रही है।
अगस्त में 10 ठिकानों पर हुई थी ED की छापेमारी
इससे पहले अगस्त 2026 में ईडी ने रामपुर, सहारनपुर और दिल्ली में जौहर ट्रस्ट और यूनिवर्सिटी से जुड़े करीब 10 ठिकानों पर तलाशी ली थी। ईडी के अनुसार यह कार्रवाई PMLA के तहत चल रही जांच का हिस्सा थी। तलाशी के दौरान वित्तीय रिकॉर्ड, दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य जुटाने पर जोर रहा। जांच का फोकस कथित तौर पर सरकारी धन के दूसरे इस्तेमाल, ट्रस्ट को मिले चंदे, यूनिवर्सिटी के निर्माण और उससे जुड़े वित्तीय लेनदेन की कड़ियां जोड़ने पर है।
क्या अब सामने आएगा ‘डमी डोनर’ का सच?
पूरे मामले में सबसे अहम सवाल उन कथित दानदाताओं को लेकर है जिनके नाम पर ट्रस्ट में बड़ी रकम आने का दावा किया गया। जांच एजेंसी अब यह पता लगाने की कोशिश कर सकती है कि दान देने वाली संस्थाएं वास्तव में सक्रिय थीं या नहीं, उनके पास रकम का वैध स्रोत क्या था और ट्रस्ट को दिया गया पैसा उनके वास्तविक कारोबार से जुड़ा था या किसी अन्य माध्यम से आया था। हालांकि, किसी व्यक्ति या कंपनी को ‘डमी डोनर’ या फर्जी दानदाता कहना तब तक उचित नहीं होगा जब तक जांच एजेंसी या अदालत के स्तर पर संबंधित तथ्य स्थापित न हो जाएं।
अब आगे क्या?
ईडी की पूछताछ और दस्तावेजों की जांच के बाद इस मामले में कई कड़ियां जुड़ सकती हैं। ट्रस्टियों और दानदाताओं के बयान, बैंक खातों का रिकॉर्ड, कंपनियों की वित्तीय स्थिति, सरकारी ठेकों से जुड़े भुगतान और यूनिवर्सिटी निर्माण पर हुए खर्च का मिलान जांच के महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं। फिलहाल यह मामला जांच के चरण में है। ईडी की कार्रवाई और जांच में सामने आ रहे दस्तावेजों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई तय होगी। इसलिए जांच में सामने आए आरोपों और अंतिम रूप से अदालत में साबित तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।

