सुप्रीम कोर्ट वकील के बयान पर लगी मुहर , नोएडा डीएम को कोर्ट से बड़ी राहत, पढ़ें अपडेट

नई दिल्ली / नोएडा। गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की जिलाधिकारी मेधा रूपम को बुधवार (23 सितंबर 2026) को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की खंडपीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा एवं सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत को रद्द करते हुए 5 लाख रुपये मुआवजा डीएम सहित संबंधित अधिकारियों की सैलरी से वसूलने का निर्देश दिया गया था। साथ ही हाईकोर्ट द्वारा डीएम के खिलाफ की गई सख्त टिप्पणियों वाले हिस्से भी फिलहाल लागू नहीं होंगे।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि मामले की गुण-दोष पर सुनवाई होने तक हाईकोर्ट के फैसले के विशेषकर पैराग्राफ 27 से 33 तक का संचालन स्थगित रहेगा। इन पैराग्राफ में डीएम के खिलाफ सख्त टिप्पणियां और मुआवजे की वसूली का निर्देश शामिल था। पक्षकारों को दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा गया है और अगली सुनवाई 7 अक्टूबर के लिए तय की गई है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक टिप्पणी की कि जब हिरासत का प्रस्ताव कई स्तरों—थाना प्रभारी, डीसीपी, कमिश्नर—से गुजरकर डीएम तक पहुंचा और बाद में NSA सलाहकार बोर्ड तथा राज्य व केंद्र सरकार ने भी इसे मंजूरी दी, तो केवल डीएम को अकेले जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं। अदालत ने कहा, “हम उसे अलग-थलग नहीं कर सकते… 5 लाख रुपये का जुर्माना।”

मेधा रूपम की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि हाईकोर्ट का आदेश “पूरी तरह अवैध” और “अनावश्यक” है। उन्होंने कहा कि डीएम केवल श्रृंखला की एक कड़ी थीं। आकृति चौधरी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने हाईकोर्ट के फैसले का बचाव किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने वर्चुअल कोर्ट की ऑडियो बंद कर मीडिया पहुंच भी सीमित कर दी थी।

मामला क्या है?

अप्रैल 2026 में नोएडा में औद्योगिक मजदूरों ने वेतन वृद्धि और हरियाणा के मजदूरों के बराबर वेतन की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था। इस दौरान हिंसा और आगजनी की घटनाएं भी हुईं। दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास की स्नातक आकृति चौधरी (लगभग 25 वर्ष) और कुछ अन्य कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। 13 मई को उत्तर प्रदेश पुलिस ने उनके खिलाफ NSA लगा दिया। आकृति करीब पांच महीने हिरासत में रहीं।

2 सितंबर 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट (जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव) ने आकृति की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका मंजूर करते हुए NSA हिरासत को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि हिरासत का आदेश पर्याप्त सामग्री के बिना और बिना उचित विचार (without application of mind) के पारित किया गया था। राज्य का संस्करण “गढ़ा हुआ” (concocted story) बताया गया। उपलब्ध सामग्री (व्हाट्सऐप चैट, वीडियो आदि) से आकृति द्वारा हिंसा भड़काने का कोई प्रमाण नहीं मिलता।

हाईकोर्ट ने डीएम मेधा रूपम के आचरण को “उपहास के योग्य” (worthy of derision) बताया और कहा कि वे आकृति को “उदाहरण” बनाना चाहती थीं ताकि मजदूरों के समर्थन में सार्वजनिक स्थान पर बोलने का अधिकार दूसरों को न मिले। अदालत ने चेतावनी दी कि अगर अधिकारियों के ऐसे “निरंकुश” व्यवहार पर अंकुश नहीं लगा तो उत्तर प्रदेश “ओरवेलियन डिस्टोपिया” में बदल सकता है। डीएम ने अपनी शपथ का उल्लंघन किया है, ऐसा भी कहा गया। हाईकोर्ट ने आकृति को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया और निर्देश दिया कि यह रकम सार्वजनिक खजाने से नहीं, बल्कि डीएम मेधा रूपम और संबंधित अधिकारियों (थाना प्रभारी तक) की सैलरी से वसूली जाए। साथ ही अदालत की नाराजगी उनके सेवा रिकॉर्ड में दर्ज करने को कहा गया।

वरिष्ठ अधिवक्ता की राय और पृष्ठभूमि

इससे पहले 15 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं मानवाधिकार आयोग से जुड़े ध्रुव कुमार ने इस प्रकरण पर अपनी राय रखी थी। उन्होंने कहा था कि NSA लगाने का आधार मुख्य रूप से पुलिस रिपोर्ट पर आधारित था, जबकि CID या विजिलेंस रिपोर्ट अलग प्रकृति की होती है। NSA उन लोगों पर लगाया जाता है जो देश की सुरक्षा के लिए अत्यंत घातक माने जाते हैं। आकृति जैसी छात्रा-कार्यकर्ता, जिनका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और जिनके खिलाफ हिंसा भड़काने का ठोस सबूत नहीं था, उन पर यह कठोर कानून लगाना उचित नहीं था।

ध्रुव कुमार ने कहा था कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रशासनिक अधिकारी किसी भी प्रदर्शनकारी या वक्ता पर कार्रवाई से पहले दो बार सोचेंगे। “अगर कोई IAS अधिकारी या मजिस्ट्रेट नियम और कानून की सीमा से बाहर जाकर कार्रवाई करता है तो हाईकोर्ट का यह आदेश उनके सिर पर तलवार की तरह लटका रहेगा।” उन्होंने अनुमान लगाया था कि सुप्रीम कोर्ट 5 लाख रुपये वाले हिस्से को वेव कर सकता है, लेकिन आदेश के बाकी हिस्से बरकरार रह सकते हैं।

कानूनी स्पष्टीकरण

NSA 1980 एक निवारक निरोध कानून है। इसके तहत बिना मुकदमा चलाए एक साल तक हिरासत में रखा जा सकता है। इसे केवल असाधारण परिस्थितियों में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। जिला मजिस्ट्रेट को पुलिस रिपोर्ट पर सिर्फ निर्भर नहीं रहना चाहिए; स्वतंत्र मूल्यांकन जरूरी है। अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन होने पर अदालत हस्तक्षेप कर सकती है और मुआवजा भी दे सकती है। हाईकोर्ट ने सार्वजनिक खजाने से नहीं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूली का आदेश दिया था, जो जवाबदेही तय करने का सख्त तरीका था।

यह राहत पूर्ण क्लीन चिट नहीं है। मामले की विस्तृत सुनवाई अभी बाकी है। यह प्रकरण प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग, नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कठोर कानूनों के दुरुपयोग की सीमाओं पर महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। आगे की सुनवाई में दोनों पक्षों के तर्कों पर फैसला आएगा। आकृति चौधरी अन्य आपराधिक मामलों में हिरासत में हैं, क्योंकि NSA हिरासत रद्द होने के बावजूद कई FIR में उनके खिलाफ कार्यवाही जारी है।

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