इंदौर/नई दिल्ली। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का युवाओं से संवाद करने वाला कार्यक्रम ‘छात्रों की गूंज’ इंदौर में एक बार फिर सुर्खियों में रहा। मंच पर घूमते हुए राहुल गांधी ने हजारों की तादाद में मौजूद युवाओं को संबोधित किया और कहा कि एक छात्र होने का मतलब सवाल पूछना है, न कि चंद लोगों द्वारा नियंत्रित ‘व्यवस्था’ के आगे चुप रहना। उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था छात्रों से डरती है क्योंकि वे सवाल पूछते हैं, और किसी भी देश को मजबूत बनाने के लिए छात्रों का सवाल उठाना जरूरी है। यह कार्यक्रम की पांचवीं कड़ी थी। इससे पहले पुणे, देहरादून, प्रयागराज और कोटा में भी ऐसे आयोजन हो चुके हैं, जहां जेन Z राहुल गांधी को मानो नई नजर से देख रहा था।
कार्यक्रम में उठे मुद्दे
इंदौर के इस कार्यक्रम में मध्य प्रदेश की प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी, 13 फीसदी पदों को रोके जाने और पारदर्शिता की कमी जैसे मुद्दे छात्रों ने उठाए। छात्रों ने आरोप लगाया कि जब वे अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो उन पर एफआईआर दर्ज कर जेल भेज दिया जाता है। वहीं एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, राहुल गांधी ने छात्रों से सीधा संवाद करते हुए शिक्षा, रोजगार और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर बात की और कहा कि छात्रों के बिना देश मजबूत नहीं हो सकता, क्योंकि आज कई छात्रों को अपना भविष्य साफ नजर नहीं आ रहा।
इसी बीच दिल्ली में कांग्रेस को झटका
लेकिन इंदौर में जब यह कार्यक्रम चल रहा था, ठीक उसी दौरान दिल्ली में कांग्रेस के लिए बुरी खबर आई। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव के नतीजों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने तीन प्रमुख पदों पर जीत हासिल की — यश डबास अध्यक्ष, रिया छावड़ी सचिव और लक्ष्यराज सिंह संयुक्त सचिव चुने गए, जबकि उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन जीते। कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI को एक भी सीट नहीं मिली। डूसू चुनाव के लिए शुक्रवार को 52 कॉलेजों में मतदान हुआ था, जिसमें करीब 40.46 फीसदी वोटिंग दर्ज की गई। इस हार पर बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय में देशभर के छात्रों का प्रतिनिधित्व होता है और अब चुनाव नतीजे सबके सामने हैं, जबकि राहुल गांधी केवल झूठ की राजनीति करना जानते हैं।
क्या कहता है यह विरोधाभास
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह नतीजा कांग्रेस के लिए एक गंभीर सबक है। इंदौर में जुटी भीड़ युवाओं की बेरोजगारी, परीक्षा संबंधी दिक्कतों और बदलाव की बेचैनी को जरूर दर्शाती है, लेकिन DUSU चुनाव में कांग्रेस की हार यह साबित करती है कि संवाद को राजनीतिक सफलता में बदलने के लिए संगठन का मजबूत होना भी उतना ही जरूरी है। यानी भीड़ जुटाना और चुनावी जमीन तैयार करना — दोनों अलग-अलग चुनौतियां हैं, और कांग्रेस को अभी संगठन खड़ा करने की कड़ी मेहनत बाकी है।
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