कोई विदेशी दबाव नहीं, उपभोक्ता फ्री रहेंगे

नई दिल्ली, केंद्र सरकार ने बुधवार को यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाए जाने के फैसले को विदेशी दबाव या अमेरिकी कंपनियों के हित में बताए जाने के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया। वित्त मंत्रालय ने साफ कहा कि भारत के UPI संबंधी सभी नीतिगत फैसले स्वतंत्र रूप से लिए जाते हैं और इनका मकसद डिजिटल पेमेंट सिस्टम को आत्मनिर्भर, समावेशी और किफायती बनाना है।

विपक्ष, खासकर कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप या अमेरिकी पेमेंट कंपनियों (वीजा, मास्टरकार्ड आदि) के दबाव में लिया गया है। कांग्रेस ने इसे ‘मोदी टैक्स’ करार देते हुए कहा कि सरकार अमेरिकी मांगों के आगे झुक गई है। कुछ नेताओं ने दावा किया कि जीरो-MDR व्यवस्था खत्म कर बड़े मर्चेंट लेनदेन पर शुल्क लगाने से विदेशी कंपनियों को फायदा होगा। इस पर वित्त मंत्रालय ने एक्स (ट्विटर) पर बयान जारी कर कहा, “कुछ दावे कहते हैं कि यह बदलाव विदेशी प्रभाव के कारण है। यह गलत है। भारत के UPI नीतिगत फैसले स्वतंत्र रूप से लिए जाते हैं, जिसका स्पष्ट लक्ष्य आत्मनिर्भर, समावेशी और किफायती डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम बनाना है।”

क्या है नया MDR शुल्क?

15 अक्टूबर 2026 से व्यक्ति से मर्चेंट (P2M) वाले UPI लेनदेन में 2,000 रुपये से ऊपर की राशि पर 0.4 प्रतिशत MDR लगेगा। यह शुल्क मर्चेंट अपने बैंक को देंगे, उपभोक्ता को कोई चार्ज नहीं देना होगा।

75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये तय की गई है। छोटी दुकानों और स्ट्रीट वेंडर्स (जो महीने में 1 लाख रुपये तक UPI से कमाई करते हैं) को पूरी छूट मिलेगी। रेलवे, टेलीकॉम, इंश्योरेंस, फ्यूल और कृषि इनपुट जैसे जरूरी क्षेत्रों में 2,000 रुपये से ऊपर के लेनदेन पर फ्लैट 5 रुपये का शुल्क लगेगा। म्यूचुअल फंड और स्टॉक ब्रोकिंग जैसे कैपिटल मार्केट लेनदेन पर 0.02 प्रतिशत शुल्क (अधिकतम 300 रुपये) लागू होगा। सरकार और एनपीसीआई के अनुसार, लगभग 96 प्रतिशत मर्चेंट लेनदेन (2,000 रुपये तक वाले) और सभी व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) ट्रांसफर पूरी तरह फ्री रहेंगे। UPI ऐप प्रोवाइडर्स भी उपभोक्ताओं से कोई प्लेटफॉर्म फीस नहीं ले सकेंगे। बैंकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे मर्चेंट्स को यह शुल्क उपभोक्ताओं पर न डालने दें।

क्यों जरूरी है यह कदम?

UPI 2016 में लॉन्च हुआ और जनवरी 2020 से मर्चेंट्स के लिए भी जीरो-MDR व्यवस्था लागू है। अगस्त 2026 में ही UPI ने 24.5 अरब लेनदेन प्रोसेस किए। इतने बड़े पैमाने पर सिस्टम चलाने का सालाना खर्च लगभग 20,000 करोड़ रुपये बताया जा रहा है। सरकार का कहना है कि सिर्फ सब्सिडी पर निर्भर रहना लंबे समय तक संभव नहीं। इस शुल्क से मिले पैसे इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सिक्योरिटी, फ्रॉड प्रिवेंशन और छोटे व्यापारियों के लिए सपोर्ट में लगाए जाएंगे। वित्त मंत्रालय ने याद दिलाया कि अगर विदेशी दबाव होता तो भारत 2016 में UPI लॉन्च ही नहीं करता और न ही इसे दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम इंटरऑपरेबल पेमेंट सिस्टम बनाता।

विपक्ष का आरोप और सरकार का जवाब

कांग्रेस ने सितंबर में जारी नोटिफिकेशन के बाद आरोप लगाया कि 2,000 रुपये से ऊपर के लेनदेन पर शुल्क लगाने का रास्ता खोलकर सरकार अमेरिकी कंपनियों को फायदा पहुंचा रही है। कुछ विशेषज्ञों ने भी कहा कि इससे फोनपे और गूगल पे जैसे बड़े प्लेयर्स को फायदा हो सकता है। सरकार ने इन आरोपों को ‘बिलकुल गलत और भ्रामक’ बताया। मंत्रालय ने जोर दिया कि UPI भारत का अपना इनोवेशन है और उपभोक्ताओं के लिए यह हमेशा फ्री रहेगा। इस फैसले के साथ सरकार ने साफ कर दिया है कि रोजमर्रा के लेनदेन पर कोई बोझ नहीं पड़ेगा। छोटे व्यापारी और आम नागरिक पहले की तरह मुफ्त में UPI का इस्तेमाल जारी रख सकेंगे, जबकि बड़े लेनदेन से सिस्टम को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सीमित शुल्क लिया जाएगा।

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