सत्यम वर्मा को जमानत, नोएडा श्रमिक हिंसा मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

प्रयागराज/नोएडा। अप्रैल 2026 में नोएडा के फेज-2 औद्योगिक क्षेत्र में हुए श्रमिक प्रदर्शन से जुड़े मामलों में जेल में बंद पत्रकार सत्यम वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट से आंशिक राहत मिली है। जस्टिस कृष्ण पहल की एकल पीठ ने उनके खिलाफ दर्ज कुल 11 आपराधिक मामलों में से एक मामले में जमानत मंजूर की है। हाईकोर्ट ने यह राहत उसी केस में पहले जमानत पा चुके एक सह-आरोपी के साथ समानता के आधार पर दी है। हालांकि बाकी मामलों में हिरासत और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत अलग से निरुद्ध होने के कारण सत्यम वर्मा का जेल से बाहर आना फिलहाल संभव नहीं है।

किस मामले में मिली जमानत

हाईकोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर के एक थाने में दर्ज केस क्राइम नंबर 164/2026 में जमानत दी है। इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से रोकने वाले कानून की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। इसी केस में बीते 23 जून को सह-आरोपी शिव कुमार उर्फ शिवा को भी अदालत जमानत दे चुकी है। उस समय कोर्ट ने पाया था कि शिव कुमार का नाम एफआईआर में सीधे दर्ज नहीं था और प्राथमिकी एक भीड़ के खिलाफ दर्ज की गई थी। शिव कुमार 14 अप्रैल 2026 से जेल में बंद थे। सत्यम वर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने एफआईआर, उपलब्ध दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों के साथ-साथ अपराध की प्रकृति, साक्ष्य, आरोपी की कथित भूमिका और संभावित सजा की गंभीरता को ध्यान में रखा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत देते समय उसने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है।

कौन हैं सत्यम वर्मा

लखनऊ निवासी 60 वर्षीय सत्यम वर्मा ‘मजदूर बिगुल दस्ते’ नाम के प्रकाशन के संपादक हैं। पुलिस का दावा है कि नोएडा श्रमिक प्रदर्शन के दौरान भड़काऊ गतिविधियों में उनकी भूमिका रही, जबकि परिजन इसे खारिज करते हैं। उन्हें 17 अप्रैल 2026 को लखनऊ से नोएडा पुलिस उठा ले गई थी और नोएडा श्रमिक प्रदर्शन से जुड़े विभिन्न मामलों में गिरफ्तार दिखाया गया। परिजनों का आरोप है कि गिरफ्तारी के तुरंत बाद उन्हें थाने या जेल की बजाय एक हॉस्टल में रखा गया और 19 अप्रैल को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया — एक ऐसी अनियमितता, जिसे परिवार ने हाईकोर्ट में चुनौती भी दी है। 13 मई को सत्यम वर्मा और छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत भी कार्रवाई की गई, जिसके चलते जमानत मिलने के बावजूद उनकी रिहाई की राह अभी लंबी है।

आकृति चौधरी मामले में भी अहम फैसला

इसी श्रमिक आंदोलन प्रकरण में सह-आरोपी बनाई गईं दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी को हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिल चुकी है। हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ लगाई गई एनएसए हिरासत रद्द कर दी थी। इस आदेश के दौरान अदालत ने नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम की भूमिका पर तीखी टिप्पणी करते हुए हिरासत आदेश पारित करने के तरीके की आलोचना की थी। गौरतलब है कि ग्रेटर नोएडा की सत्र अदालत आकृति की चार में से तीन जमानत अर्जियां पहले खारिज कर चुकी थी, जबकि एक मामले में उन्हें राहत मिली थी। इसके बाद वे सुप्रीम कोर्ट भी गई थीं, जहां से उन्हें सीधे जमानत देने के बजाय हाईकोर्ट जाने की सलाह दी गई। आकृति चौधरी और सत्यम वर्मा समेत कई अन्य लोगों के खिलाफ हिंसा भड़काने, आगजनी तथा सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने के आरोपों में मुकदमे दर्ज हैं। परिजनों के मुताबिक आकृति अब जेल से बाहर आकर अपनी कानून की पढ़ाई पूरी करेंगी। वे नेट परीक्षा पास कर चुकी थीं, लेकिन गिरफ्तारी के कारण डॉक्टोरल प्रोग्राम में दाखिला नहीं ले सकीं।

सत्यम वर्मा के परिवार का अगला कदम

आकृति चौधरी को मिली एनएसए राहत के बाद सत्यम वर्मा के परिवार ने भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी है, जिसमें उन्होंने सत्यम की एनएसए हिरासत को चुनौती दी थी। परिवार अब इसके बजाय सीधे इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख करने की योजना बना रहा है और जल्द ही एक नई बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दाखिल करने की तैयारी में है, ताकि मामले की तेज सुनवाई हो सके। सुप्रीम कोर्ट में सत्यम से जुड़ी याचिका को 7 सितंबर के लिए सूचीबद्ध किया गया था, जिसमें परिवार इसे वापस लेने की मांग करेगा।

पृष्ठभूमि: 13 अप्रैल की घटना

नोएडा के फेज-2 औद्योगिक क्षेत्र में 13 अप्रैल 2026 को वेतन वृद्धि और काम की बेहतर परिस्थितियों की मांग को लेकर श्रमिकों ने प्रदर्शन किया था। पुलिस के मुताबिक इस दौरान कुछ स्थानों पर वाहनों में आगजनी, जबरन परिसर में प्रवेश और पथराव जैसी घटनाएं हुईं, जिसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज कर बड़ी संख्या में श्रमिकों के साथ सात कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया था। पुलिस का आरोप है कि सत्यम वर्मा ने विभिन्न इलाकों में लोगों को कथित तौर पर उकसाकर सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने का प्रयास किया, हालांकि परिजन और साथी कार्यकर्ता इन आरोपों को बेबुनियाद बताते रहे हैं। फिलहाल स्थिति यह है कि एक मामले में जमानत मिलने के बावजूद सत्यम वर्मा की हिरासत अन्य लंबित आपराधिक मामलों और एनएसए के तहत निरुद्धि के कारण जारी रहेगी। आने वाले दिनों में इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल होने वाली नई हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई ही तय करेगी कि उनकी रिहाई कब तक हो पाएगी।

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