नई दिल्ली। हिमालय क्षेत्र एक गंभीर पारिस्थितिक ‘टिपिंग पॉइंट’ की ओर बढ़ रहा है। इस महीने जारी एक नई अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक, यहां ग्लेशियर एक दशक पहले की तुलना में कहीं तेज गति से पिघल रहे हैं, जिससे सदी के मध्य तक क्षेत्र में “पीक वॉटर” (जल प्रवाह के चरम) की स्थिति आने और जल सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडराने की आशंका जताई गई है। यह रिपोर्ट सस्टेनेबिलिटी एडवाइजरी फर्म सिस्टमिक (Systemiq) ने इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव, इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट और भारत के जी.बी. पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट के साथ मिलकर तैयार की है।
नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर हादसे के बाद रिपोर्ट को गंभीरता से लिया जा रहा
यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब अगस्त के आखिरी सप्ताह में नेपाल-तिब्बत सीमा पर एक हिमालयी ग्लेशियर के टूटने से भीषण तबाही मची थी। 26 अगस्त 2026 की सुबह शुरू हुई इस आपदा में चीन-नेपाल सीमा पर स्थित ग्यिरोंग पोर्ट सीमा चौकी नष्ट हो गई और त्रिशूली नदी के किनारे 72 किलोमीटर के दायरे में बसे दर्जनों गांव प्रभावित हुए। ग्लेशियर के एक हिस्से के टूटने से आई इस बाढ़ और भूस्खलन ने घाटियों में भारी तबाही मचाई। इस आपदा में नेपाल में कम से कम 1,386 लोगों की मौत हो चुकी है और 5,130 लोग लापता हैं, जबकि तिब्बत में 43 मौतें और 519 लोग लापता बताए गए हैं। बाढ़ में बड़ी संख्या में घर, स्कूल, दुकानें, वाहन और लोग बह गए। राहत और बचाव कार्य अब भी जारी है।
अस्थिर ग्लेशियल झीलें बनी खतरे की वजह
रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे-जैसे ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, वे अपने पीछे ऐसी अस्थिर ग्लेशियल झीलें छोड़ रहे हैं जो सिर्फ ढीली चट्टानों और बर्फ के सहारे टिकी हैं और ये झीलें उन घाटियों के ठीक ऊपर स्थित हैं जहां लाखों लोग रहते हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया कि हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र, जो अफगानिस्तान से लेकर म्यांमार तक आठ देशों में फैला एक विशाल पर्वतीय तंत्र है, वहां अनुमानित 40,000 ग्लेशियरों में से केवल 21 की ही जमीनी निगरानी हो रही है। भारत में करीब 200 ग्लेशियल झीलों को उच्च जोखिम वाला चिन्हित किया गया है, जिनमें से 56 झीलों को “अत्यधिक उच्च जोखिम” श्रेणी में रखा गया है। इससे नीचे बसे लाखों लोगों की सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है।
“पीक वॉटर” और अर्थव्यवस्था पर असर
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जैसे-जैसे क्षेत्र “पीक वॉटर” की स्थिति के करीब पहुंचेगा — यानी वह बिंदु जहां नदियों का जल प्रवाह बढ़ना बंद होकर घटने लगता है — इसका जल सुरक्षा पर गहरा असर पड़ेगा। हिमालय क्षेत्र भारत की जीडीपी में 20% से अधिक का योगदान देता है और यह देश के आर्थिक ढांचे की एक अहम कड़ी है, जिस पर करोड़ों लोगों की आजीविका निर्भर है। रिपोर्ट के अनुसार, हिमालय क्षेत्र भारत के कुल भूभाग का लगभग 18% हिस्सा होने के बावजूद देश में होने वाली लगभग 35% प्राकृतिक आपदाओं के लिए जिम्मेदार है, जो इस क्षेत्र की बढ़ती संवेदनशीलता को दर्शाता है।
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