675 करोड़ की परियोजना, फिर भी खाली सीटें
गौतमबुद्ध नगर जिले में तीनों प्राधिकरणों नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यीडा ने मिलकर एक संयुक्त विशेष प्रायोजन कंपनी (एसपीवी) के जरिए 675 करोड़ रुपये की कुल परियोजना लागत के साथ 500 इलेक्ट्रिक बसें चलाने की योजना तैयार की, जिनमें 300 बसें नोएडा में, 100 ग्रेटर नोएडा में और शेष 100 यीडा क्षेत्र में उतारी जानी हैं। योजना के मुताबिक इन बसों का उद्देश्य नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट तक सीधी कनेक्टिविटी देना भी है और इन्हें जिले के करीब 25 अहम मार्गों पर उतारा जाना था।लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट में तस्वीर कुछ और ही सामने आई। परी चौक से 62 तक जाने वाली बस में यात्रियों की संख्या मुश्किल से चार-पांच रही, जबकि पूरी बस खाली नजर आई। इसी दौरान बस स्टॉप के पास खड़े ऑटो रिक्शा जल्दी भर जाते हैं और सवारियां उन्हीं में बैठना पसंद करती हैं।
किराया बराबर, फिर भी लोग ऑटो को दे रहे तरजीह
हैरानी की बात यह है कि परी चौक से सेक्टर 62 तक ई-बस और ऑटो दोनों का किराया लगभग बराबर यानी करीब ₹20 है। इसके बावजूद यात्री ऑटो को प्राथमिकता दे रहे हैं। बातचीत में कई यात्रियों ने बताया कि उनके लिए पैसा नहीं, बल्कि समय ज्यादा मायने रखता है। ऑटो 15 से 20 मिनट में गंतव्य तक पहुंचा देता है, जबकि ई-बस को हर स्टॉप पर रुकने और लंबा रूट कवर करने में करीब आधा घंटा या उससे ज्यादा वक्त लग जाता है। कुछ यात्रियों ने यह भी कहा कि उन्हें बस के रूट और स्टॉपेज की सही जानकारी ही नहीं है, जिस वजह से वे इसे इस्तेमाल करने से कतराते हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर और समय-सारणी की कमी बनी बड़ी वजह
हाल की रिपोर्टों से यह भी सामने आया कि परियोजना शुरू होने के दो महीने बाद भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। एक स्थानीय रिपोर्ट में बताया गया कि बस संचालन तो शुरू हो चुका है, मगर दोनों शहरों में तय बस शेल्टरों के निर्माण में कोई ठोस प्रगति नजर नहीं आई है नतीजा यह कि न यात्रियों को यह पता चलता है कि बस किस जगह मिलेगी, और न ही चालकों को स्पष्ट रूप से पता होता है कि उन्हें कहां रुकना है, जिस वजह से करोड़ों की लागत वाली ये बसें बिना सवारी के सड़कों पर घूमती रहती हैं। समय-सारणी को लेकर भी शिकायतें पुरानी हैं। सेवा शुरू होने के शुरुआती दिनों में ही सामने आया था कि संचालन शुरू हो जाने के बाद भी कोई निश्चित टाइम-टेबल तय न होने के कारण लोग घंटों सड़क किनारे बस के इंतजार में खड़े रहे, और आखिरकार थक-हारकर उन्हें ऑटो या कैब पकड़नी पड़ी। यह दिक्कत महीनों बाद भी बरकरार है हाल ही में एक यात्री ने बताया कि सूरजपुर से परी चौक के बीच ई-बस पकड़ने के लिए करीब आधे घंटे रुकना पड़ता है, और कई बार तो इतना इंतजार करने पर भी बस नहीं आती। वहीं परी चौक-तिलपता-दादरी रूट पर भी यात्रियों को एक-एक घंटे तक बस का इंतजार करना पड़ रहा है। किराए को लेकर भी असंतोष सामने आया है, जहां अधिक दूरी के रूटों पर ऊंचे किराये के चलते बसें खाली दौड़ने की खबरें सामने आई हैं।
जवाबदेही पर उठे सवाल
स्थानीय पत्रकारों और नागरिकों का कहना है कि इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बावजूद न तो ठोस तैयारी की गई और न ही जिम्मेदारी तय की गई। इस पूरे मसले को लेकर एक स्थानीय रिपोर्ट में सवाल उठाया गया कि आखिर यह योजना जनता के लिए राहत बनने की बजाय “सफेद हाथी” साबित क्यों हो रही है।
जनता की राय — सुविधा अच्छी, लेकिन पहुंच अधूरी
बस में सफर करने वाले कुछ यात्रियों ने माना कि सीटें आरामदायक हैं और पहली बार बस में सफर करना उन्हें अच्छा लगा। एक महिला यात्री ने कहा कि सफर के दौरान अच्छा अनुभव रहा और साथ बैठे सहयात्रियों के साथ माहौल भी बेहतर लगा। लेकिन बड़ी संख्या में लोग अब भी टेम्पो और ऑटो को ही प्राथमिकता देते नजर आए, क्योंकि उनके इलाके में बस सेवा की जानकारी और पहुंच सीमित है।
2027 चुनाव से पहले सरकार के लिए चुनौती
गौरतलब है कि 2027 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, ऐसे में यह सवाल अहम हो जाता है कि करोड़ों की लागत से बनी यह महत्वाकांक्षी परियोजना जमीनी स्तर पर जनता तक अपनी पूरी उपयोगिता के साथ क्यों नहीं पहुंच पा रही। विशेषज्ञों और स्थानीय निवासियों का मानना है कि अगर नोएडा प्राधिकरण समय पर बस स्टॉप, शेल्टर, स्पष्ट समय-सारणी और रूट की जानकारी को दुरुस्त कर दे, तो यह योजना असल मायनों में कारगर साबित हो सकती है। फिलहाल स्थिति यह है कि सरकार की महत्वाकांक्षी ई-बस सेवा सड़कों पर दौड़ तो रही है, लेकिन सवारियों के इंतजार में खाली की खाली।

