Noida traffic jam: प्राधिकरण की खराब प्लानिंग या ट्रैफिक पुलिस? नागरिकों का आरोप, DSC रोड और मॉल निर्माण पर सवाल

Noida traffic jam: नोएडा, जो कभी सुनियोजित शहर (प्लान्ड सिटी) के रूप में जाना जाता था, आज रोजाना ट्रैफिक जाम की समस्या से जूझ रहा है। स्थानीय नागरिक और ट्रैफिक विशेषज्ञ लंबे समय से यह आरोप लगा रहे हैं कि समस्या ट्रैफिक पुलिस की नहीं, बल्कि नोएडा प्राधिकरण की खराब प्लानिंग और बिना क्षमता मूल्यांकन के जमीन बेचने की नीति की है। वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन सड़कों की कैरीइंग कैपेसिटी पर कोई गंभीर सर्वे या नियंत्रण नहीं दिखता।

प्लान्ड सिटी में प्लानिंग की कमी

नागरिकों का कहना है कि मास्टर प्लान का मकसद यही होता है कि हर सड़क पर कितना ट्रैफिक होगा, कितने मकान, दुकान और मॉल बनेंगे, इसका पहले से आकलन हो। लेकिन 2040-2050 के मास्टर प्लान की स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं। हर शहर की एक कैरीइंग कैपेसिटी होती है। नोएडा की भी है, लेकिन इस पर बात नहीं होती कि शहर कितने फ्लैट, मकान और मॉल झेल सकता है। निवेश दिखाने के नाम पर हर उपलब्ध जमीन बेची जा रही है।

सेक्टर 71 से 76 डीएससी रोड की तरफ जाते हुए दोनों तरफ जमीन बेच दी गई। 51 मेट्रो स्टेशन पर पहले से जाम लगता है, सीएनजी पंप और रेस्टोरेंट हैं, और अब बड़े मॉल आने वाले हैं। सेक्टर 72 की तरफ रोड पतली है, सर्विस रोड नहीं है, फिर भी नए कमर्शियल प्रोजेक्ट खोले जा रहे हैं। 75 की तरफ एक किलोमीटर का मॉल और सामने सेक्टर 50 में नया मॉल व हॉस्पिटल—यह प्लानिंग है? हैजीपुर अंडरपास वाला चौराहा शहर के सबसे व्यस्त चौराहों में से एक है। फिर भी दोनों तरफ बड़े मॉल खुलवा दिए गए। एक खुल चुका है, दूसरा खुल रहा है। सर्विस रोड खत्म हो गई। सबसे व्यस्त चौराहे को मॉल से भर देना प्लानिंग नहीं कही जा सकती।

एलिवेटेड रोड और जाम शिफ्ट करने की शिकायत

एकीकृत ट्रैफिक प्लान की कमी भी प्रमुख मुद्दा है। शहर की पहली एमपी-2 एलिवेटेड रोड बनाते समय सुझाव दिए गए थे कि अंडरपास को क्रॉस कर या सेक्टर 58-59 के अंदर लूप बनाया जाए, वरना जाम बढ़ेगा। लेकिन कुछ नहीं हुआ। नतीजा—ट्रैफिक जाम सेक्टर 59 और 66 की सड़कों पर शिफ्ट हो गया। शाम के समय 61 अंडरपास से बादशाहपुर टेंडर पास तक 5 किलोमीटर का सफर 25-30 मिनट या उससे ज्यादा लेता है। शहर के ज्यादातर अंडरपास जाम को एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित कर रहे हैं। डीएससी एलिवेटेड रोड (भंगेल एलिवेटेड रोड) 2020 में शुरू हुई थी। नागरिकों ने तब भी लिखा था कि सेक्टर 7x, 47, 46 के लिए लूप बनाया जाए, वरना फायदा नहीं होगा। छह साल के फॉलोअप के बाद टेंडर हुआ और अब चार-पांच साल बाद बनेगा। इस बीच सेक्टर 41 की तरफ रोज जाम लग रहा है। जो काम पांच-सात साल पहले होना चाहिए था, वह देर से हो रहा है, जबकि ट्रैफिक दबाव बढ़ चुका है।

2017 की मीटिंग और व्यवस्था की कमी

नवंबर 2017 में एक मेगा ट्रैफिक मीटिंग हुई थी, जिसमें तत्कालीन डीएम, एसएसपी और अधिकारी शामिल थे। 10 से ज्यादा पॉइंट्स का प्रेजेंटेशन दिया गया था कि शहर को जाम-मुक्त कैसे बनाया जाए। उनमें से शायद ही दो पॉइंट्स पर काम हुआ। प्राधिकरण के पास अपना ट्रैफिक इंजीनियर या टाउन प्लानर नहीं है; सब कुछ कंसल्टेंट्स पर निर्भर है। 12 साल से ट्रैफिक मुद्दों पर काम करने वाले नागरिकों का कहना है कि सिर्फ एक सीईओ आलोक टंडन जी ने इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए नियमित मीटिंग की थी। उसके बाद ध्यान कम हो गया और ट्रैफिक सेल बना दिया गया। नागरिकों की मांग है कि ट्रैफिक पुलिस को इन मुद्दों पर खुलकर लिखना चाहिए, क्योंकि खराब प्लानिंग का नुकसान आम जनता और पुलिस दोनों को होता है। जाम लगने पर लोग पुलिस से सवाल करते हैं, जबकि मॉल बनाने की इजाजत और जमीन प्राधिकरण ने दी है। शहर की मुख्य सड़कों का सर्वे करके कैपेसिटी बतानी चाहिए कि अब और दुकान-मॉल-फ्लैट नहीं चल सकते। रोड नंबर 6 इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।

ताजा विकास और प्राधिकरण के दावे

हाल के महीनों में प्राधिकरण ने कुछ कदम उठाए हैं। नवंबर 2025 में 4.5 किलोमीटर लंबी भंगेल एलिवेटेड रोड (डीएससी रोड पर, करीब 608 करोड़ रुपये) ट्रायल के लिए खोली गई, जिससे कुछ राहत मिली। अगस्त 2026 में प्राधिकरण ने डीएससी मार्ग और सेक्टर-79 टी-पॉइंट को 25.53 करोड़ रुपये की लागत से मॉडल रोड बनाने का प्रस्ताव दिया है। सिंचाई नाले से कुलेसरा पुल तक 14.97 करोड़ और सेक्टर-79 टी-पॉइंट से डीएससी तक 10.57 करोड़ खर्च होंगे। मंजूरी मिलने पर छह महीने में काम पूरा करने का लक्ष्य है। भंगेल एलिवेटेड रोड से आने वाले ट्रैफिक के कारण अभी भी सुबह-शाम जाम की शिकायतें हैं।

इसके अलावा 50 किलोमीटर लंबी एलिवेटेड रोड (करीब 4000 करोड़ रुपये) नोएडा से ग्रेटर नोएडा और एयरपोर्ट की तरफ प्रस्तावित है, जिसका रूट फाइनल हो चुका है। रजनीगंधा चौक से सेक्टर 57 तक 5.4 किलोमीटर एलिवेटेड रोड (करीब 700 करोड़) और अन्य प्रोजेक्ट्स भी पाइपलाइन में हैं। मास्टर प्लान 2041 (डीएनजीआईआर) भी मौजूद है। लेकिन आलोचक कहते हैं कि ये प्रोजेक्ट्स देर से आ रहे हैं और मूल समस्या बिना कैपेसिटी के व्यावसायिक विकास पर ध्यान नहीं दिया जा रहा।

अन्य संबंधित मुद्दे

नागरिकों ने नालों की सफाई पर भी सवाल उठाए हैं। सेक्टर 52 पुलिस चौकी के पास भारी खर्च के बावजूद बदबूदार, अस्वास्थ्यकर और जहरीली गैस पैदा करने वाली स्थिति बनी हुई है। स्वास्थ्य विभाग को सर्कल में मिलाने के बाद सफाई की जिम्मेदारी धुंधली हो गई है। कैमरे लगाने से चालान तो कट रहे हैं, लेकिन जाम नियंत्रण पर फोकस कम दिखता है। शाम को सेक्टर 74-77 नॉर्थ आई चौराहे पर बाइक-ऑटो रेड लाइट जंप करते हैं, ई-रिक्शा लेफ्ट ब्लॉक करके खड़े होते हैं। चालान का डर भी कम होता जा रहा है। ट्रैफिक पुलिस का कहना है कि उनके हाथ में सीमित संसाधन हैं। सड़कों पर वाहनों की संख्या इतनी है कि सिर्फ प्रबंधन से जाम पूरी तरह नहीं हट सकता। प्राधिकरण से रोड इंजीनियरिंग सुधार की मांग की जा रही है।

नागरिकों का सुझाव है कि घटिया सड़क निर्माण और गलत प्लानिंग के लिए एसीबी में शिकायत दर्ज कराई जाए। अधिकारियों को जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। जब तक शहर की कैरीइंग कैपेसिटी का सम्मान नहीं किया जाता और एकीकृत ट्रैफिक प्लान नहीं बनता, रंगीन लाइटों और मॉडल रोड से समस्या का स्थायी हल नहीं निकलेगा। यह रिपोर्ट नागरिकों की शिकायतों और हालिया आधिकारिक अपडेट्स पर आधारित है। प्राधिकरण से प्रतिक्रिया के लिए संपर्क किया जा रहा है।
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