Tamil Nadu NEET Bill: चेन्नई। तमिलनाडु विधानसभा ने मंगलवार को नीट (NEET) के अस्तित्व के ही खिलाफ एक प्रस्ताव पारित कर दिया। बता दें कि नीट एक राष्ट्रीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा है, जो हाल के महीनों में पेपर लीक विवाद को लेकर सुर्खियों में रही थी, जिसके चलते बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे और भाजपा नेता धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
किस-किस ने किया समर्थन?
राज्य में सत्ताधारी टीवीके और कांग्रेस समेत उसके सहयोगी दलों के अलावा, मुख्य विपक्षी दल डीएमके, एआईएडीएमके, पीएमके और वामपंथी दलों ने भी इस नीट विरोधी प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं सदन में मौजूद एकमात्र भाजपा विधायक ने प्रस्ताव के विरोध में वॉकआउट कर दिया।
स्वास्थ्य मंत्री ने क्या आग्रह किया?
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के.जी. अरुणराज ने सदन में यह प्रस्ताव पेश किया, जिसमें भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से स्नातक चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए नीट को समाप्त करने का आग्रह किया गया है।
अरुणराज का आरोप
अरुणराज ने आरोप लगाते हुए कहा कि नीट ने छात्रों का ध्यान स्कूली पाठ्यक्रम से हटाकर सिर्फ कोचिंग पर केंद्रित कर दिया है, जिससे महंगे कोचिंग सेंटरों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है।
टीवीके का तर्क
मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली टीवीके पार्टी के वरिष्ठ नेता अरुणराज ने आगे कहा कि यह परीक्षा ग्रामीण और सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित छात्रों के लिए चिकित्सा शिक्षा के अवसरों को गंभीर रूप से कमजोर करती है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में लगातार सरकारों ने यही रुख अपनाया है कि नीट सामाजिक न्याय, समानता और राज्यों के अधिकारों के खिलाफ है।
अगर नीट नहीं तो क्या विकल्प?
प्रस्ताव में केंद्र सरकार से संबंधित कानूनों में संशोधन कर एकसमान नीट प्रणाली को खत्म करने की मांग की गई है। विजय सरकार का प्रस्ताव है कि राज्य में मेडिकल कोर्सेज में दाखिला कक्षा 12 की परीक्षा के अंकों के आधार पर हो — यह वही रुख है जो पिछली डीएमके सरकार भी अपना चुकी है।
प्रस्ताव के मुख्य तर्क
तमिलनाडु विधानसभा पहले भी वर्ष 2021 में विधेयक संख्या 43 के जरिए राज्य को नीट से छूट देने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर चुकी है, लेकिन राष्ट्रपति की मंजूरी न मिलने से यह विधेयक अब तक लंबित है। नीट प्रणाली तमिल माध्यम, ग्रामीण और आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों की चिकित्सा शिक्षा तक पहुंच को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। महंगे और अनियमित कोचिंग सेंटरों पर बढ़ती निर्भरता से छात्रों की स्कूली शिक्षा प्रभावित हो रही है। 12 साल की स्कूली पढ़ाई के बाद एक दिन की परीक्षा उच्च शिक्षा के लिए निर्णायक बन गई है।
पेपर लीक का हवाला
प्रस्ताव में बार-बार प्रश्नपत्र लीक होने और परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ियों का जिक्र किया गया है। इसमें नीट-यूजी के रद्द होकर दोबारा आयोजित होने की घटना का भी उल्लेख है, जिससे योग्य छात्रों को भारी परेशानी हुई और सिस्टम पर भरोसा कमजोर हुआ। साथ ही परीक्षा तनाव से जुड़ी छात्र आत्महत्याओं का भी हवाला दिया गया है। इसके लिए केंद्र सरकार को राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम 2019, भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयोग अधिनियम 2020, होम्योपैथी आयोग अधिनियम 2020 और अन्य संबंधित कानूनों में संशोधन करना होगा।
नीट कब लागू हुआ था?
मेडिकल प्रवेश की खंडित व्यवस्था बदलने के लिए 2013 में पहली बार नीट लागू करने का प्रस्ताव आया था। इससे पहले प्रवेश प्रक्रिया AIPMT के जरिए 15% राष्ट्रीय कोटा और 85% राज्य स्तरीय परीक्षाओं में बंटी थी। लंबे कानूनी संघर्ष के बाद 2017 तक यह अनिवार्य राष्ट्रव्यापी परीक्षा बनी और 2020 तक AIIMS जैसे प्रमुख संस्थान भी इसमें शामिल हो गए।
तमिलनाडु में नीट की आलोचना क्यों?
तमिलनाडु का तर्क रहा है कि नीट उन्हीं छात्रों को फायदा पहुंचाता है जो महंगी कोचिंग का खर्च उठा सकते हैं, और यह केंद्रीकृत परीक्षा राज्यों के अधिकार क्षेत्र और भारतीय संघवाद के विरुद्ध है। डीएमके और एआईएडीएमके दोनों के शासनकाल में यह विरोध लगातार जारी रहा है। पेपर लीक विवाद के बाद कर्नाटक और पश्चिम बंगाल सरकारों ने भी परीक्षा रद्द करने के प्रस्ताव पारित किए थे, जबकि केरल और आंध्र प्रदेश-तेलंगाना से भी लगातार विरोध और कानूनी चुनौतियां सामने आती रही हैं।

