UPI fee dispute: आम लोगों की जेब नहीं, मर्चेंट्स पर बोझ, पर पर्दे के पीछे ट्रंप का दबाव?

UPI fee dispute: नई दिल्ली। क्या डॉनल्ड ट्रंप अब आम भारतीयों की जेब पर असर डालेंगे? यह सवाल पिछले कुछ दिनों से चर्चा में है, जब यूपीआई पेमेंट्स पर शुल्क लगाए जाने की खबरें सामने आईं। हालांकि 7 अगस्त को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि यूपीआई से भुगतान करने वाले आम उपयोगकर्ताओं से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। यह प्रस्तावित शुल्क सीधे उपभोक्ताओं की जेब से नहीं, बल्कि यूपीआई मर्चेंट्स—जैसे रुपे, गूगल पे और फोनपे जैसी कंपनियों—से वसूला जाएगा। लेकिन असली सवाल यह है कि आखिर यह शुल्क लगाया ही क्यों जा रहा है, और अगर यह जरूरी था तो अब तक क्यों नहीं लगाया गया? इसका जवाब भारत-अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ता में छिपा है।

संसद में पेश हुआ बिल

इसी हफ्ते वित्त मंत्रालय ने संसद में एक बिल पेश किया, जिसका उद्देश्य बैंकों और पेमेंट सिस्टम कंपनियों को यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड लेनदेन पर शुल्क वसूलने की अनुमति देना है। गौर करने वाली बात यह है कि यह बिल ठीक उसी समय आया है, जब भारत और अमेरिका अपनी व्यापार डील के अंतिम चरण में हैं।

वीजा-मास्टरकार्ड की पुरानी शिकायत

2016 में यूपीआई लॉन्च होने के बाद से ही वीजा और मास्टरकार्ड जैसी अमेरिकी भुगतान कंपनियां शिकायत करती रही हैं कि भारतीय उपभोक्ता कार्ड की बजाय मुफ्त यूपीआई की ओर तेजी से बढ़े हैं, जिससे उनका कारोबार प्रभावित हुआ। दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार, इन कंपनियों की मुख्य आपत्ति यूपीआई-रुपे पर शून्य शुल्क, सरकार द्वारा रुपे को दिए जा रहे बढ़ावे और क्रेडिट कार्ड भुगतान तक रुपे की तेज पहुंच को लेकर रही है। दरअसल कार्ड कंपनियों की कमाई का बड़ा हिस्सा मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) से आता है—यह वह शुल्क है जो हर लेनदेन पर बैंकों और दुकानदारों से वसूला जाता है। मुफ्त और सर्वसुलभ यूपीआई ने इस कमाई को सीमित कर दिया है।

USTR की रिपोर्ट और 30% की सीमा

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने इस साल मार्च में भारत की डिजिटल भुगतान नीतियों को व्यापार बाधा करार दिया था। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि नवंबर 2020 में एनपीसीआई (नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया) ने नियम बनाया था कि कोई भी थर्ड-पार्टी ऐप कुल यूपीआई लेनदेन का 30% से अधिक हिस्सा नहीं संभाल सकता। यह सीमा जनवरी 2023 में लागू होनी थी, लेकिन इसे टालकर अब दिसंबर 2026 कर दिया गया है। USTR के मुताबिक, 31 दिसंबर 2025 तक अमेरिका-समर्थित फोनपे और गूगल पे मिलकर ही 80% से ज्यादा यूपीआई लेनदेन संभाल रहे थे।

भारत पहले ही कर चुका है कई रियायतें

व्यापार समझौते के तहत भारत डिजिटल क्षेत्र में अमेरिका की कई मांगें पहले ही मान चुका है—जैसे विदेशी डेटा सेंटर कंपनियों को 2047 तक टैक्स छूट और पिछले साल 6% गूगल टैक्स को खत्म करना, जिसे अमेरिकी टेक कंपनियों के खिलाफ माना जा रहा था।

भारत अकेला नहीं, ब्राजील, इंडोनेशिया, चीन भी निशाने पर

भारत के अलावा ब्राजील, इंडोनेशिया, वियतनाम, तुर्की, खाड़ी देश और चीन जैसी अर्थव्यवस्थाएं भी अमेरिका के इसी दबाव का सामना कर रही हैं। पिछले महीने अमेरिका ने ब्राजील पर व्यापार कानून की धारा 301 के तहत 25% टैरिफ लगाया, जिसकी एक बड़ी वजह ब्राजील का लोकप्रिय भुगतान प्लेटफॉर्म ‘पिक्स’ (Pix) बताया गया, जो यूपीआई से काफी मिलता-जुलता है।

निष्कर्ष

ऊपर से देखने पर भारत का यूपीआई शुल्क बिल एक घरेलू फैसला लगता है, लेकिन इसके पीछे अमेरिका के व्यापारिक दबाव और डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन की डिजिटल भुगतान नीतियों की एक बड़ी वैश्विक कहानी जुड़ी है।

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