Yamuna Authority’s gross negligence: ग्रेटर नोएडा (यमुना सिटी), यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। प्राधिकरण ने विभिन्न सेक्टरों में अस्पताल और संस्थागत (Institutional) उपयोग के लिए अलग-अलग आकार के भूखंडों की योजना तो लॉन्च कर दी, लेकिन अब लगभग तीन महीने बीत जाने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं है कि इस योजना का आगे क्या भविष्य होगा। आलम यह है कि जिन अस्पताल संचालकों ने भूखंड पाने की इच्छा जताते हुए आवेदन किया था, प्राधिकरण ने उनकी आवेदन राशि (रिफंड) वापस करनी शुरू कर दी है।
सड़क की चौड़ाई बनी गले की फांस
प्राधिकरण की ओर से रिफंड किए जाने के पीछे जो तर्क दिया गया है, उसने YEIDA के नियोजन (Planning) विभाग की पोल खोलकर रख दी है।
तर्क: प्राधिकरण ने आवेदकों को पत्र/संदेश भेजकर कहा है कि रिफंड इसलिए किया जा रहा है क्योंकि आवंटित किए जाने वाले भूखंड 12 मीटर चौड़ी सड़क पर स्थित हैं।
नियम: स्वास्थ्य एवं संस्थागत श्रेणियों के मानकों के अनुसार, अस्पताल जैसी महत्वपूर्ण सुविधाओं के लिए सड़कों की चौड़ाई अधिक होनी चाहिए ताकि भविष्य में ट्रैफिक और इमरजेंसी वाहनों की आवाजाही में बाधा न आए।
बड़ा सवाल: जब प्राधिकरण के अपने ही भूखंड निर्धारित क्राइटेरिया (मानकों) को पूरा नहीं कर रहे थे, तो बिना तैयारी और जांच-परख के योजना निकाली ही क्यों गई? इस लापरवाही के कारण निवेशकों और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों का समय और संसाधन दोनों बर्बाद हुए हैं।
तीसरी बार बढ़ी डेडलाइन, लेकिन असमंजस बरकरार
एक तरफ जहां प्राधिकरण रिफंड की प्रक्रिया पूरी कर रहा है, वहीं दूसरी ओर योजना की समय सीमा को बार-बार बढ़ाया जा रहा है।
तीसरी बार विस्तार: प्राधिकरण ने इच्छुक अस्पताल संचालकों और संस्थाओं के लिए आवेदन करने की अंतिम तिथि को बढ़ाकर 31 जुलाई कर दिया है।
अस्पष्टता: यह तीसरी बार है जब अंतिम तिथि बढ़ाई गई है। लेकिन बुनियादी सवाल अब भी बना हुआ है—जब भूखंडों का आकार और सड़क की चौड़ाई मानकों के अनुरूप नहीं है, तो आवेदन की तारीख बढ़ाने का क्या औचित्य है?
निवेशकों और अस्पताल संचालकों में नाराजगी
यमुना सिटी को एक एजुकेशन और मेडिकल हब के रूप में विकसित करने का दावा किया जाता है। जेवर एयरपोर्ट के पास स्थित होने के कारण कई प्रमुख अस्पताल समूह और निवेशक यहां अपने सेंटर स्थापित करना चाहते हैं।
हालांकि, प्राधिकरण के इस ढुलमुल रवैये से निवेशकों के बीच भारी निराशा और असमंजस का माहौल है:
वित्तीय ब्लॉक: तीन महीने तक आवेदकों का पैसा फंसा रहा।
नियोजन की कमी: बिना ग्राउंड रियलिटी जांचे स्कीम लॉन्च करने से प्राधिकरण की साख पर असर पड़ा है।
दिशाहीनता: बार-बार डेडलाइन बढ़ाने के बावजूद प्राधिकरण के पास कोई स्पष्ट कार्ययोजना नजर नहीं आ रही है।
आगे क्या?
फिलहाल प्राधिकरण के अधिकारी इस पूरे मामले पर कुछ भी खुलकर बोलने से बच रहे हैं। देखने वाली बात यह होगी कि 31 जुलाई की समय सीमा समाप्त होने के बाद क्या प्राधिकरण सड़क के लेआउट में बदलाव कर नए सिरे से योजना लाएगा, या इस योजना को पूरी तरह रद्द कर दिया जाएगा।

