Trump imposes 200% tariffs on generic drugs: नई दिल्ली/वाशिंगटन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 22 जुलाई 2026 को ट्रुथ सोशल पर एक बड़े ऐलान के जरिए वैश्विक फार्मास्यूटिकल ट्रेड को हिला दिया। उन्होंने आयातित जेनेरिक दवाओं (Generic Drugs) पर चरणबद्ध तरीके से भारी टैरिफ लगाने का प्लान पेश किया है। यह फैसला तुरंत नहीं, बल्कि विदेशी कंपनियों को अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स स्थापित करने के लिए दो साल की पर्याप्त मोहलत देकर लागू होगा।
ट्रंप ने ‘0-100-200’ फॉर्मूला अपनाते हुए कहा कि यह कदम अमेरिका में जेनेरिक दवाओं के उत्पादन को वापस लाने (Reshoring) और विदेशी निर्भरता — खासकर भारत और कच्चे माल (API) के लिए चीन — को कम करने के लिए है, जिसे वे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा मानते हैं।
टैरिफ का पूरा टाइमलाइन
1 अगस्त 2026 से अगस्त 2028 तक (2 साल): सभी आयातित जेनेरिक दवाओं पर 0% टैरिफ (कोई बदलाव नहीं)।
अगस्त 2028 से एक साल तक: 100% आयात शुल्क।
अगस्त 2029 से: 200% टैरिफ।
नोट: पेटेंटेड, ब्रांडेड या इनोवेटिव दवाओं पर मौजूदा नीतियों में कोई बदलाव नहीं। यह ऐलान केवल जेनेरिक्स पर केंद्रित है। ट्रंप के मुताबिक, जो कंपनियां समयसीमा में अमेरिका में प्लांट नहीं लगाएंगी, उन्हें भारी आर्थिक सजा भुगतनी पड़ेगी।
भारत पर गहरा असर: ‘दुनिया की फार्मेसी’ दबाव में
भारत अमेरिका के लिए सबसे बड़ा जेनेरिक दवाओं का सप्लायर है। अमेरिकी फार्मेसियों में बिकने वाली जेनेरिक दवाओं के 40-47% प्रिस्क्रिप्शन भारतीय कंपनियां पूरी करती हैं। साल 2025 में भारत ने कुल $25.8 बिलियन दवाओं का निर्यात किया, जिसमें $9.7 बिलियन (करीब 38%) अकेले अमेरिका को गया।
प्रभावित प्रमुख कंपनियां:
सन फार्मा (Sun Pharma)
डॉ. रेड्डीज (Dr. Reddy’s)
लुपिन (Lupin)
अरबिंदो फार्मा (Aurobindo Pharma)
अन्य: जेनेरिक्स, ग्लेनमार्क, टोरेंट आदि (कई कंपनियों का US एक्सपोजर 30-50%+ है)। विशेषज्ञों का कहना है कि लो-मार्जिन जेनेरिक बिजनेस पर टैरिफ का असर गंभीर हो सकता है, जिससे कीमतें बढ़ सकती हैं और अमेरिकी बाजार में कमी आ सकती है।
क्या यह पूरी तरह नुकसानदेह है? अवसर भी मौजूद
उद्योग जगत और विशेषज्ञों (जैसे Indian Pharmaceutical Alliance) के अनुसार स्थिति अभी पूरी तरह निराशाजनक नहीं, 2 साल की मोहलत: कंपनियां अमेरिका में प्लांट लगा सकती हैं, पार्टनरशिप बढ़ा सकती हैं या लोकल प्रोडक्शन शुरू कर सकती हैं। कई कंपनियां (जैसे Aurobindo) पहले से US में मौजूद हैं।
डाइवर्सिफिकेशन: यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया में निर्यात बढ़ाने का मौका।
नीति की अनिश्चितता: अभी कोई आधिकारिक एक्जीक्यूटिव ऑर्डर या डिटेल्ड गाइडलाइंस जारी नहीं हुई। यह टैरिफ Finished Formulations पर है या API पर भी — स्पष्टता का इंतजार। भारतीय कंपनियां US हेल्थकेयर को सालाना $200 बिलियन की बचत कराती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि गुणवत्ता और लागत में भारतीय दवाओं की तुलना मुश्किल है, इसलिए पूर्ण शिफ्ट चुनौतीपूर्ण रहेगा।
बाजार प्रतिक्रिया और आगे क्या?
घोषणा के तुरंत बाद भारतीय फार्मा स्टॉक्स में कुछ दबाव देखा गया, लेकिन 2 साल की विंडो के कारण पैनिक नहीं छाया। विश्लेषक लंबे समय में US एक्सपोजर वाली कंपनियों पर नजर रखने की सलाह दे रहे हैं। ट्रंप प्रशासन का फोकस राष्ट्रीय सुरक्षा, जॉब्स और सप्लाई चेन रिस्क कम करने पर है, जबकि भारत के लिए यह रणनीतिक समायोजन का समय है। इस खबर के प्रकाशन तक कोई आधिकारिक भारतीय सरकार प्रतिक्रिया या ट्रेड डील की पुष्टि नहीं हुई है। विकास पर नजर रखें।

