सुप्रीम कोर्ट में हाई वोल्टेज ड्रामा: जजों को ‘न्यायिक सेवक’ कहा, CJI को अपशब्द बोले, कोर्ट रूम में उछाले कागज, फिर भी नहीं हुई अवमानना की कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप ने जजों को ‘न्यायिक सेवक’ कहा, कागज उछाले और CJI को अपशब्द कहे।कोर्ट की मानवीय टिप्पणी और याचिका का नतीजा।

सुप्रीम कोर्ट में हंगामा: नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत में शुक्रवार, 10 जुलाई को एक ऐसा नज़ारा देखने को मिला जिसने पूरे कोर्ट रूम को स्तब्ध कर दिया। खुद अपना मुकदमा लड़ रहे याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप यादव ने सुनवाई के दौरान न सिर्फ जजों को आदेश देने की कोशिश की, बल्कि उन्हें ‘योर ऑनर’ या ‘माई लॉर्ड’ कहने के बजाय ‘न्यायिक सेवक’ (जुडिशियल सर्वेंट) कहकर संबोधित किया। मामला और बिगड़ा जब उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया और अपने पास मौजूद फाइल के करीब 185 पन्ने कोर्ट रूम में हवा में उछाल दिए।

क्या हुआ था कोर्ट रूम में

यह सुनवाई जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के सामने सुबह करीब 11 बजे हुई। जब बेंच ने प्रबल प्रताप से पूछा कि क्या वे स्वयं ही अपना पक्ष रखेंगे, तो उन्होंने अंग्रेज़ी में कहा मिस्टर जुडिशियल सर्वेंट, मैं आपको आदेश देता हूं कि लखनऊ के विकासनगर थाने के एसीपी के खिलाफ साइबर अपराध का मामला दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। इस पर हैरान जस्टिस विश्वनाथन ने पूछा कि क्या वे अदालत को आदेश दे रहे हैं। जवाब में प्रबल प्रताप ने खुद को “संप्रभु” (sovereign) बताते हुए अपनी बात दोहराई और कहा कि उनकी तरफ से बस इतना ही कहना है, बाकी सब रिकॉर्ड पर है। इसके बाद स्थिति अचानक बिगड़ गई उन्होंने चीफ जस्टिस सूर्यकांत के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया और फाइल के पन्ने जजों की तरफ उछाल दिए। हालात संभालते हुए सुरक्षाकर्मी तुरंत हरकत में आए और उन्हें कोर्ट रूम से बाहर ले गए। कुछ समय के लिए उन्हें परिसर स्थित डीएसपी कार्यालय में हिरासत में भी रखा गया।

अदालत का संयमित और मानवीय रुख

इतने गंभीर और अशोभनीय व्यवहार के बावजूद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने याचिकाकर्ता के खिलाफ अवमानना या किसी अन्य दंडात्मक कार्रवाई से इनकार कर दिया। जस्टिस विश्वनाथन ने टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता बेहद परेशान और हताश नजर आ रहे थे, और यह व्यवहार उसी निराशा से उपजा प्रतीत होता है। बेंच ने कहा कि इस स्थिति में उनके मन में याचिकाकर्ता के प्रति गुस्से की बजाय केवल सहानुभूति है। न्यायपालिका के इस संयमित रुख की सोशल मीडिया और कानूनी हलकों में खूब चर्चा और सराहना हो रही है।

याचिका क्यों खारिज हुई

प्रबल प्रताप इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ के एक आदेश को चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। मामला मूल रूप से एक निजी सॉफ्टवेयर कंपनी से जुड़ा है, जहां वे कार्यरत थे। कंपनी के अनुसार, उन पर एक महिला सहकर्मी को आपत्तिजनक ईमेल भेजने और परेशान करने के आरोप लगे थे, जिसके बाद पहले चेतावनी दी गई और बाद में उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। इससे नाराज़ प्रबल प्रताप ने कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग करते हुए लखनऊ की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत का रुख किया था, लेकिन अदालत ने पुलिस रिपोर्ट के आधार पर इसे एफआईआर के बजाय निजी शिकायत के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया। इस फैसले से असंतुष्ट होकर वे इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचे, जहां भी उन्हें राहत नहीं मिली हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास वैकल्पिक कानूनी उपाय मौजूद हैं। इसके बाद वे विशेष अनुमति याचिका (SLP) लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने का कोई ठोस आधार नहीं बनता, और याचिका को खारिज कर दिया गया।

पहले भी हो चुकी है ऐसी घटना

यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट में इस तरह की अभद्रता देखी गई हो। बीते साल 6 अक्टूबर 2025 को तत्कालीन चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने वकील राकेश किशोर ने जूता उछालने की कोशिश की थी, जो भगवान विष्णु को लेकर की गई एक टिप्पणी से नाराज़ थे। हालांकि उस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल कोई सख्त कार्रवाई नहीं की थी, बाद में बार काउंसिल ऑफ इंडिया और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने संबंधित वकील की सदस्यता और लाइसेंस रद्द कर दिया था।

निष्कर्ष

प्रबल प्रताप का यह मामला अदालत की गरिमा बनाए रखने की ज़रूरत और न्यायपालिका के मानवीय दृष्टिकोण के बीच एक दिलचस्प संतुलन का उदाहरण बन गया है। एक तरफ कोर्ट रूम में अनुशासन और मर्यादा बनाए रखना ज़रूरी है, तो दूसरी तरफ जजों ने यह भी माना कि कई बार व्यक्ति की मानसिक हताशा उसके व्यवहार के पीछे की वजह हो सकती है। हालांकि, इस सहानुभूति के बावजूद अदालत ने कानून और तथ्यों के आधार पर याचिका को बिना किसी मेरिट के खारिज कर दिया, यह स्पष्ट संदेश देते हुए कि असहमति या शिकायत दर्ज कराने का सही रास्ता संवैधानिक और वैधानिक प्रक्रिया से होकर ही गुजरता है।

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