राष्ट्रीय राजनीति में हाशिए पर गुर्जर समाज? क्या करेंगे बीजेपी के ख़िलाफ़ बगावत? 

राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कथित अनदेखी से नाराज अखिल भारतीय गुर्जर महासभा ने सोमवार को नोएडा सेक्टर 61 स्थित शिवालिक में “राष्ट्र की राजनीति और गुर्जर समाज का समावेश” विषय पर विचार गोष्ठी और पत्रकार वार्ता का आयोजन किया। 1908 में स्थापित इस संगठन ने केंद्र और राज्यों की राजनीति में समाज की घटती भागीदारी पर गहरी चिंता जताते हुए आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इसका असर दिखाने की चेतावनी दी।

“तीन-चार मंत्री पद घटकर एक राज्यमंत्री तक सिमटे”

महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मंत्री हरिशचंद्र भाटी ने पत्रकारों से कहा कि केंद्र और राज्यों दोनों स्तर पर लगभग सभी राजनीतिक दलों, खासकर भारतीय जनता पार्टी ने गुर्जर समाज को संगठन और सरकार में पहले की तुलना में बहुत कम जगह दी है। उनका कहना था कि जिन कैबिनेटों में पहले समाज से तीन-चार मंत्री हुआ करते थे, वहां अब महज एक राज्यमंत्री बनाकर औपचारिकता निभा दी गई है और समाज इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है। भाटी ने स्पष्ट किया कि 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में समाज इसी आधार पर फैसला लेगा। उन्होंने दावा किया कि गुर्जर मतदाताओं के साथ ओबीसी वर्ग और कई श्रमिक जातियां भी इस मुद्दे पर एकजुट हैं, और जब तक कैबिनेट व संगठन दोनों में पर्याप्त भागीदारी नहीं मिलती, तब तक यह असंतोष बना रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया के माध्यम से यह संदेश प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

जमीन पर भी दिख रहा असंतोष

भाटी का यह बयान महज प्रतीकात्मक नहीं है। मई 2026 में हुए योगी कैबिनेट विस्तार में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से गुर्जर समाज के एकमात्र प्रतिनिधि डॉ. सोमेंद्र तोमर को राज्यमंत्री से राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तो बनाया गया, लेकिन इसी दौरान उनसे प्रभावशाली ऊर्जा विभाग छीन कर कम असर वाला विभाग सौंप दिया गया। राजनीतिक हलकों में इसे समाज के कद में कटौती के तौर पर देखा गया, जबकि उत्तर प्रदेश में गुर्जर समाज का राजनीतिक इतिहास उपमुख्यमंत्री स्तर तक रहा है रामचंद्र विकल और नारायण सिंह जैसे नेता इस पद तक पहुंच चुके हैं, और चौधरी यशपाल सिंह, बाबू हुकुम सिंह जैसे कई नेता पूर्ण कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर मतदाता परंपरागत रूप से भाजपा का मजबूत आधार माने जाते रहे हैं, लेकिन प्रतिनिधित्व में कमी के चलते विपक्षी दलों के लिए भी इस नाराजगी का फायदा उठाने की गुंजाइश बढ़ी है ऐसे में महासभा की यह पत्रकार वार्ता 2027 के चुनाव से पहले इस सामाजिक समूह की राजनीतिक सौदेबाजी को मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखी जा रही है।

संगठन का रुख और आगे की राह

गोष्ठी में महासभा ने यह भी रेखांकित किया कि सामाजिक समावेश और व्यापक प्रतिनिधित्व के बिना समग्र विकास अधूरा है। हाल के महीनों में महासभा शिक्षा, संगठन और राजनीतिक भागीदारी के एजेंडे पर गांव-गांव जाकर बैठकें और सम्मेलन कर रही है, जिनमें युवाओं की भागीदारी और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अभियान पर भी जोर दिया जाता रहा है। नोएडा की इस पत्रकार वार्ता को इसी सिलसिले की अगली कड़ी और राजनीतिक दलों पर दबाव बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। कार्यक्रम में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के प्रतिनिधि शामिल हुए। महासभा ने सभी मीडियाकर्मियों के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि यह मुद्दा अब केवल सामाजिक नहीं, बल्कि 2027 के चुनावी समीकरणों का भी हिस्सा बन गया है।

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