टाटा और JSW जैसी भारतीय कंपनियां चीन की चेरी से प्लेटफॉर्म ले रही हैं; बीजिंग के निर्यात नियंत्रण के बावजूद तकनीकी निर्भरता बढ़ी
भारत ने 2020 की सीमा झड़प के बाद से चीनी कार निर्माताओं को अपने बाज़ार से व्यावहारिक रूप से बाहर रखा है, और अब बीजिंग भी अपनी इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) तकनीक के निर्यात पर सख्ती बरत रहा है। लेकिन इन सबके बावजूद दुनिया के तीसरे सबसे बड़े कार बाज़ार में चीनी ईवी तकनीक का दखल लगातार बढ़ रहा है, यह बात रॉयटर्स की एक ताज़ा रिपोर्ट में सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, टाटा मोटर्स ने जून महीने की शुरुआत में बताया था कि वह अपनी प्रीमियम इलेक्ट्रिक कारें बनाने के लिए चीनी कंपनी चेरी के कारमेकिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करेगी। यह सौदा किसी हिस्सेदारी (इक्विटी) पर आधारित नहीं है, और दोनों कंपनियों ने इस पर ज़ोर दिया है कि यह सिर्फ एक सप्लाई व्यवस्था है, जिसमें टाटा को किसी तरह की तकनीकी जानकारी का हस्तांतरण नहीं किया जाएगा। यह सावधानी दोनों देशों के बीच मौजूद राजनीतिक संवेदनशीलता को दिखाती है।
फ्रीलैंडर प्लेटफॉर्म से बनेगी ‘अविन्या’ ब्रांड की EV
सूत्रों के मुताबिक टाटा मोटर्स, चेरी और जगुआर लैंड रोवर (JLR) के संयुक्त उपक्रम से बने ‘फ्रीलैंडर’ प्लेटफॉर्म का उपयोग करेगी। इस प्लेटफॉर्म पर बनी पहली अविन्या (Avinya) कार 2027 में चीन से किट के रूप में आयात होकर तमिलनाडु स्थित टाटा के नए संयंत्र में असेंबल की जाएगी, जबकि स्थानीय पुर्जों की सोर्सिंग पर भी काम शुरू हो गया है। दूसरी इलेक्ट्रिक कार 2029 में आने की योजना है, और आगे और भी मॉडल जोड़े जा सकते हैं। यह कदम टाटा की मूल योजना से एक बड़ा बदलाव है। कंपनी पहले JLR के ‘इलेक्ट्रिफाइड मॉड्यूलर आर्किटेक्चर’ (EMA) पर आधारित अविन्या मॉडल 2025 तक लाने की तैयारी में थी, लेकिन JLR ने भारत में EMA-आधारित ईवी बनाने की योजना ही ठंडे बस्ते में डाल दी, जिससे टाटा को अपनी रणनीति पूरी तरह बदलनी पड़ी। एक सूत्र ने इसे टाटा के लिए “स्टॉप-गैप व्यवस्था” बताया, क्योंकि नए उत्पादों के बिना कंपनी अपनी ईवी बाज़ार में बढ़त खो सकती थी। चेरी ने रॉयटर्स को दिए बयान में कहा कि वह सिर्फ टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स की एक सप्लायर के रूप में काम करेगी, और हर परियोजना अपनी अलग व्यावसायिक शर्तों के तहत चलेगी।
JSW मोटर भी चेरी की राह पर
टाटा अकेली नहीं है। सज्जन जिंदल की JSW मोटर ने भी चेरी के साथ करीब 20 अरब रुपये (लगभग 209 मिलियन डॉलर) के अग्रिम भुगतान और रॉयल्टी के साथ एक समान सौदा किया है। JSW इस वेंचर में 3 अरब डॉलर का निवेश कर रही है और 2030 तक 3 लाख वाहन बेचने का लक्ष्य रखती है। शुरुआती गाड़ियां भी चीन से आयातित किट के रूप में आएंगी, और धीरे-धीरे पश्चिमी भारत के संयंत्र में स्थानीय सप्लाई चेन तैयार की जाएगी।
सरकार की रणनीति: तकनीक हां, फैक्ट्री नहीं
एक वरिष्ठ भारतीय सरकारी अधिकारी ने रॉयटर्स से कहा कि सरकार उन सौदों का समर्थन करती है जो आगे चलकर स्थानीय निर्माण और सप्लाई-चेन में बदलाव की दिशा ले जाएं, और चीन के साथ डील का यही सही तरीका है। दूसरी ओर, चीनी ईवी निर्माताओं के लिए, जो घरेलू बाज़ार में सुस्ती और अतिरिक्त उत्पादन क्षमता से जूझ रहे हैं, ऐसे सौदे बीजिंग के निर्यात नियंत्रण आदेशों का उल्लंघन किए बिना कमाई बढ़ाने का ज़रिया बन सकते हैं। विश्लेषक गाओ हुआ, जो चाइना SAE के पूर्व निदेशक रह चुके हैं, ने कहा कि चीनी कंपनियां ऐसे सप्लाई सौदों के ज़रिए भारत में पैर जमाने के महत्व को समझती हैं। उनके शब्दों में, अगर चीनी कंपनियां इसमें शामिल नहीं होंगी, तो दूसरे देशों की कंपनियां यह जगह ले लेंगी। यह स्थिति जापानी कार निर्माताओं के लिए बुरी खबर है, जो भारत में बड़ा निवेश कर रहे हैं, आंशिक रूप से इसलिए कि अभी तक उन्हें वहां चीनी प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ता।
बैटरी तकनीक पर बीजिंग की सख्ती से भारतीय कंपनियां प्रभावित
जहां प्लेटफॉर्म-लाइसेंसिंग सौदे आगे बढ़ रहे हैं, वहीं बैटरी तकनीक के मामले में चीन के निर्यात नियंत्रण भारतीय कंपनियों को मुश्किल में डाल रहे हैं। 2025 में, अमेरिकी टैरिफ के जवाब में बीजिंग द्वारा लगाए गए निर्यात नियंत्रणों के चलते भारतीय बैटरी निर्माता अमारा राजा को चीन की गोशन (Gotion) के साथ लिथियम-आयन सेल तकनीक के लाइसेंसिंग सौदे को बंद करना पड़ा। अमारा राजा के कार्यकारी निदेशक विक्रमादित्य गौरीनेनी ने रॉयटर्स को बताया कि सारा तकनीकी सहयोग रुक गया है। उन्होंने कहा कि इस सौदे से कंपनी को फैक्ट्री और लाइन के ले-आउट, तकनीकी रोडमैप और वेंडर बेस से जुड़ने में जो समझ मिली, वही असली हासिल थी। लाइसेंसिंग डील बंद होने के बाद अमारा राजा अब अपने इन-हाउस रिसर्च एंड डेवलपमेंट और टैलेंट में निवेश बढ़ा रही है। कंपनी अब भी चीनी सप्लायरों से उपकरण, बैटरी सेल और अन्य सामग्री आयात कर रही है ताकि अपने सेल-निर्माण लक्ष्यों को पूरा कर सके, लेकिन ऑपरेशनल सहायता के लिए चीन से इंजीनियरों को बुलाने के लिए पर्याप्त वीज़ा हासिल करना उसके लिए चुनौती बना हुआ है। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को भी इसी तरह की मुश्किल का सामना करना पड़ा है। गुजरात के जामनगर में बन रहे रिलायंस के गीगाफैक्ट्री के लिए महंगी मशीनें पहुंच तो गईं, लेकिन बीजिंग द्वारा बैटरी-निर्माण तकनीक और उपकरणों पर नियंत्रण कड़े किए जाने के बाद आगे की चीनी तकनीक पहुंच के बिना व्यावसायिक उत्पादन शुरू होना मुश्किल हो गया है।
भारत के लिए दोहरी चुनौती
विश्लेषकों का मानना है कि भारत अमेरिका जैसी आक्रामक “डीकपलिंग” रणनीति नहीं अपना रहा, बल्कि एक संतुलित दृष्टिकोण रख रहा है मकसद घरेलू ईवी इकोसिस्टम को मज़बूत बनाना है, चीन से पूरी तरह अलग होना नहीं। टाटा मोटर्स, महिंद्रा एंड महिंद्रा और ओला इलेक्ट्रिक जैसी बड़ी भारतीय कंपनियां अब भी लिथियम-आयन सेल और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स कलपुर्जों के लिए चीनी सप्लायरों पर निर्भर हैं, भले ही अंतिम असेंबली भारत में ही हो रही हो। मार्च के अंत में भारत ने 35 से अधिक ईवी कलपुर्जों पर टैरिफ घटाया था, जिनमें से ज़्यादातर अब भी चीन से ही आते हैं — इससे दोनों देशों के बीच तकनीकी आदान-प्रदान और आसान हो गया है। विश्लेषकों के अनुसार भारत का अपना ईवी उद्योग हीरो इलेक्ट्रिक के दिवालिया होने की कार्यवाही, ब्लूस्मार्ट के बंद होने और ओला इलेक्ट्रिक की कमज़ोर होती स्थिति जैसी घटनाओं के बीच अभी भी संघर्ष कर रहा है, जबकि चार पुरानी, स्थापित कंपनियां भारत के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी बाज़ार के लगभग 80 फीसदी हिस्से पर कब्ज़ा रखती हैं। कुल मिलाकर, रॉयटर्स की रिपोर्ट यह दर्शाती है कि भारत अपनी सीमाओं पर चीनी कंपनियों को रोकने में भले कामयाब रहा हो, लेकिन चीन की तेज़, सस्ती और तकनीकी रूप से उन्नत ईवी क्षमताओं को बाज़ार से पूरी तरह बाहर रखना उसके लिए लगभग नामुमकिन साबित हो रहा है।
यह भी पढ़ें: लखनऊ अग्निकांड: 15 मौतें, सेफ्टी लैप्स की जांच, गिरफ्तारियां और निलंबन

