पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता के बीच भारत का अमेरिका से तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) आयात जून महीने में अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुंचने जा रहा है। उद्योग सूत्रों के मुताबिक भारत इस महीने अमेरिका से करीब 11 से 12 लाख टन एलपीजी प्राप्त करेगा, जो पहली बार 10 लाख टन के आंकड़े को पार करेगा।
मई के मुकाबले लगभग दोगुना आयात
डेटा एनालिटिक्स फर्म केप्लर के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार जून में अमेरिका से करीब 10.7 लाख टन एलपीजी आयात होने का अनुमान है, जबकि मई में यह आंकड़ा 6.48 लाख टन था। यानी महीने-दर-महीने आयात में लगभग दोगुने की बढ़ोतरी हो रही है। इसके साथ ही संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से आयात भी मई के 1.35 लाख टन से बढ़कर जून में 3 से 4 लाख टन के बीच पहुंचने का अनुमान है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से शुरू हुआ संकट
यह बदलाव अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच हुए युद्ध तथा उसके बाद होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी का सीधा नतीजा है। इस टकराव से पहले भारत अपनी कुल एलपीजी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता था, जो औसतन हर महीने करीब 20 लाख टन होता था। लेकिन स्ट्रेट बंद होने के बाद अप्रैल में आयात घटकर मात्र 6.96 लाख टन तक गिर गया था। मई में इसमें सुधार आया और आयात 11.5 लाख टन तक पहुंचा। सप्लाई संकट की वजह से भारतीय रिफाइनरियों को मजबूरन स्पॉट मार्केट में भारी प्रीमियम चुकाकर अमेरिका से अभूतपूर्व मात्रा में एलपीजी खरीदना पड़ा, ताकि घरेलू रसोई गैस की सप्लाई बाधित न हो। सरकार ने इसके साथ रिफाइनरियों को उत्पादन बढ़ाने, घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देने और पाइप्ड गैस कनेक्शन का विस्तार तेज करने का निर्देश भी दिया, जिससे एलपीजी खपत में 15 से 20 प्रतिशत की कमी आई है।
यूएई से भी राहत के संकेत
जून में यूएई से सप्लाई में सुधार के पीछे ओमान के सोहार पोर्ट से लोड होने वाले कार्गो की भूमिका अहम रही। सूत्रों के अनुसार यूएई ने सऊदी सीपी कीमतों से करीब 100 डॉलर प्रति टन के प्रीमियम पर फ्री-ऑन-बोर्ड आधार पर कार्गो की पेशकश की, जिसके लिए अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी ने चार से पांच जहाज तैनात किए। इसके अतिरिक्त कुवैत से भी जून में लगभग 45,000 टन एलपीजी मिलने की उम्मीद है। केप्लर के आंकड़े बताते हैं कि ईरान से भी लगभग 1.16 लाख टन और कुवैत से 1.08 लाख टन सप्लाई का अनुमान है, जबकि ओमान, सऊदी अरब, अल्जीरिया, कतर और नाइजीरिया से भी कुछ मात्रा आने की संभावना है।
अमेरिका बना सबसे बड़ा सप्लायर, खाड़ी की हिस्सेदारी घटी
यह स्थिति भारत के ऊर्जा आयात ढांचे में बड़े बदलाव को दर्शाती है। फरवरी 2026 में भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी महज 8 प्रतिशत थी, जो अप्रैल तक एक-तिहाई तक पहुंच गई और मई में 55 प्रतिशत तक जा पहुंची। इसके विपरीत परंपरागत खाड़ी सप्लायरों सऊदी अरब, यूएई, कतर और ओमान की संयुक्त हिस्सेदारी फरवरी के 81 प्रतिशत से घटकर मई में मात्र 16 प्रतिशत रह गई। यह बदलाव भारत-अमेरिका के बीच 2025 के अंत में हुए 22 लाख टन वार्षिक एलपीजी सप्लाई के दीर्घकालिक समझौते की पृष्ठभूमि में भी देखा जा रहा है, जिसके तहत भारत वाशिंगटन के साथ व्यापार असंतुलन कम करने की दिशा में अमेरिकी ऊर्जा खरीद बढ़ाने की रणनीति पर पहले से काम कर रहा था।
तेल कंपनियों को भारी नुकसान, उपभोक्ताओं पर सीमित असर
क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरामको की कॉन्ट्रैक्ट प्राइस, जो भारतीय एलपीजी आयात के लिए मुख्य बेंचमार्क है, फरवरी से जून के बीच 46 प्रतिशत तक बढ़ गई। इसके चलते सरकारी तेल विपणन कंपनियों को करीब 22,000 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान है। हालांकि सरकार ने घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में केवल 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी करते हुए आम उपभोक्ताओं को सीधा झटका देने से बचाया, जबकि कमर्शियल और औद्योगिक सिलेंडरों के दाम 79 प्रतिशत से अधिक बढ़ाए गए।
आगे क्या?
सूत्रों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के आंशिक रूप से खुलने से आने वाले महीनों में खाड़ी क्षेत्र से सप्लाई में और सुधार आएगा, जिससे कीमतों पर दबाव कम होने की उम्मीद है। हालांकि अमेरिका से लंबी अवधि के अनुबंधों और बढ़ती निर्भरता को देखते हुए विश्लेषकों का मानना है कि भारत की एलपीजी आयात संरचना में आया यह बदलाव अल्पकालिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक पुनर्गठन की दिशा में बढ़ता कदम साबित हो सकता है।

