इवियाँ से भारत की धमक: जी7 मंच पर मोदी का ‘ग्लोबल साउथ’ एजेंडा, ट्रंप से हाई-स्टेक्स मुलाकात पर भारतीय नाविकों की मौत का साया भी मंडराया

जिनेवा झील के किनारे बसे खूबसूरत फ्रांसीसी शहर इवियाँ-ले-बाँ में इन दिनों दुनिया की सबसे ताकतवर सरकारों का जमघट लगा हुआ है। 52वाँ जी7 शिखर सम्मेलन (15-17 जून 2026) यहाँ आयोजित है और इसकी मेज़बानी फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों कर रहे हैं। इस प्रतिष्ठित बैठक में भारत एक बार फिर ‘पार्टनर देश’ के रूप में शामिल हुआ है और इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति ने जी7 के गलियारों में एक अलग ही ऊर्जा भर दी। यह प्रधानमंत्री मोदी की जी7 में लगातार सातवीं उपस्थिति है और भारत की लगातार आठवीं जी7 आमंत्रण  जो इस बात का प्रमाण है कि विश्व की प्रमुख औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएं भारत को अब वैश्विक मेज पर अनिवार्य साझेदार मानती हैं।

मैक्रों का न्योता और ‘G7 + BRICS’ की अनोखी जुगलबंदी

फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों ने मोदी को व्यक्तिगत रूप से इस शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया था। मुंबई में एक प्रेस वक्तव्य में मैक्रों ने कहा था कि इस वर्ष भारत BRICS की अध्यक्षता कर रहा है जबकि फ्रांस G7 की  ऐसे में दोनों देशों की साझेदारी में एक ऐतिहासिक अवसर है। फ्रांस के विदेश मंत्रालय ने भी स्वीकार किया कि भारत की G7 में भागीदारी उस महत्व को दर्शाती है जो फ्रांस BRICS अध्यक्ष के रूप में भारत को देता है विशेषकर वैश्विक आर्थिक असंतुलन और अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के मुद्दों पर।

ट्रंप-मोदी मुलाकात: 16 महीने बाद आमना-सामना, पर माहौल तनावपूर्ण

इस शिखर सम्मेलन की सबसे चर्चित घटना रही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात। मंगलवार को G7 के आउटरीच सत्र में दोनों नेताओं ने हाथ मिलाए और संक्षिप्त बातचीत की यह उनकी 16 महीनों बाद पहली आमने-सामने मुलाकात थी। एक औपचारिक द्विपक्षीय बैठक बुधवार के लिए निर्धारित की गई। बुधवार को हुई इस द्विपक्षीय बैठक में दोनों नेताओं ने आर्थिक विकास, आपूर्ति श्रृंखला, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), निवेश साझेदारी और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों पर व्यापक चर्चा की।

लेकिन यह बैठक उतनी सहज नहीं थी जितनी दिखी।

इस हाई-स्टेक्स बैठक से पहले भारत-अमेरिका संबंधों पर व्यापार टैरिफ, H-1B वीजा शुल्क वृद्धि और भू-राजनीतिक मध्यस्थता के दावों को लेकर तनाव की स्थिति रही। ओमान की खाड़ी में अमेरिकी नौसैनिक कार्रवाई में तीन भारतीय नाविकों की मौत का मुद्दा भी कूटनीतिक चर्चाओं में प्रमुखता से उठा। इवियाँ में G7 के मंच पर मोदी ने ‘भारतीय नागरिकों की जानें जाने’ का मुद्दा उठाया, हालाँकि उन्होंने सीधे तौर पर ओमान की खाड़ी की घटनाओं का नाम नहीं लिया। इससे पहले भारत ने अमेरिकी प्रभारी राजदूत को दो बार तलब किया था और विदेश मंत्री जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो से फोन पर कड़ा विरोध जताया था।

होर्मुज़ संकट की पृष्ठभूमि में भारत की भूमिका

भारत ने इस संकट के दौरान लगातार संवाद और कूटनीति का रास्ता अपनाने की वकालत की है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से लगभग 20% वैश्विक तेल व्यापार गुजरता है जिसके बाधित होने से भारत में ईंधन की कीमतें, महँगाई और आर्थिक विकास सीधे प्रभावित होते हैं। भारत ने ईरान, कतर, जॉर्डन और अन्य खाड़ी देशों के साथ भी संवाद बनाए रखा है और ऊर्जा बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा तथा तनाव घटाने की जरूरत पर जोर दिया है।

द्विपक्षीय बैठकों की झड़ी: कनाडा, UK, UAE से साझेदारी को नया आयाम

शिखर सम्मेलन के हाशिये पर प्रधानमंत्री मोदी ने कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्ने, ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन ज़ायद अल नह्यान से द्विपक्षीय बैठकें कीं।

‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज बना भारत

प्रधानमंत्री मोदी ने G7 के नेताओं, आमंत्रित देशों के राष्ट्राध्यक्षों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रमुखों के साथ ऊर्जा सुरक्षा, AI-ऊर्जा नेक्सस और क्वांटम तकनीक जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। भारत हमेशा G7 में ग्लोबल साउथ की चिंताओं को प्रमुखता से उठाता रहा है। इस बार G7 में भारत के अलावा ब्राजील, केन्या, दक्षिण कोरिया और सीरिया भी आमंत्रित देशों में शामिल थे।

विश्लेषण: G7 मंच पर भारत की साख

जी7 सदस्य न होने के बावजूद भारत की उपस्थिति इस मंच पर उत्तरोत्तर प्रभावशाली होती जा रही है। कनाडाई प्रधानमंत्री कार्ने ने पहले ही कहा था कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है — इसलिए वह इस मेज पर होना चाहिए। होर्मुज़ संकट, AI गवर्नेंस, ऊर्जा सुरक्षा और ग्लोबल साउथ, इन सभी मोर्चों पर भारत की आवाज़ इवियाँ में गूँजी। लेकिन भारतीय नाविकों की मौत का अनसुलझा दर्द और ट्रंप-मोदी संबंधों में आई खटास यह भी याद दिलाती है कि कूटनीति का रास्ता कभी सरल नहीं होता।

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