चालीसा बनाम नमाज़: मलिहाबाद का कसमंडी विवाद, इतिहास, धर्म और सियासत का त्रिकोण, सपा पर बोझ, बचाए किसे

सारंस: 

बकरीद से पहले प्रशासन ने लगाई दोनों पक्षों पर रोक, सपा-भाजपा में तकरार, 2027 के चुनाव की आहट के बीच पासी समाज के आंदोलन ने यूपी की राजनीति को नया रंग दिया, लखनऊ के मलिहाबाद में कसमंडी किला-मस्जिद विवाद तेज, पासी समाज ने दावा किया,  यह राजा कंसा पासी का किला और शिव मंदिर है, मुस्लिम पक्ष ने कहा, यह सदियों पुरानी मस्जिद और मजार है, बकरीद से पहले प्रशासन ने सभी धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगाई, भारी पुलिस तैनात, सपा सांसदों की चुप्पी पर लाखन आर्मी ने जताई तीखी नाराजगी, 2027 चुनाव से पहले भाजपा-सपा में सियासी घमासान शुरू

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से महज 25 किलोमीटर दूर मलिहाबाद क्षेत्र के कसमंडी कला गाँव में एक पुराने धार्मिक ढाँचे को लेकर जो विवाद सुलग रहा था, वह अब राजनीति की आग में पूरी तरह भड़क उठा है। एक तरफ पासी समाज और उससे जुड़े संगठन इस स्थल को 11वीं सदी के राजा कंसा पासी का ऐतिहासिक किला और महादेव मंदिर बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ मुस्लिम पक्ष इसे सदियों पुरानी मस्जिद और मजार घोषित कर रहा है। इस टकराव के बीच जिला प्रशासन ने बकरीद से पहले विवादित स्थल पर सभी धार्मिक गतिविधियों पर अस्थायी रोक लगा दी है और भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

क्या है पूरा विवाद?

लखनऊ के मलिहाबाद क्षेत्र में स्थित कसमंडी कला गाँव इन दिनों एक ऐतिहासिक और धार्मिक विवाद का केंद्र बना हुआ है। विवाद उस पुराने ढाँचे को लेकर है, जिस पर दो समुदाय अलग-अलग दावे कर रहे हैं। पासी समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह स्थल 11वीं सदी के नागवंशी शासक राजा कंसा पासी के ऐतिहासिक किले का हिस्सा था। वे यह भी दावा करते हैं कि परिसर में भगवान महादेव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर था, जिसे समय के साथ बदलकर मस्जिद और कब्रिस्तान में तब्दील कर दिया गया। हिंदू पक्ष का तर्क है कि इस टीले की नींव और ढहे हुए हिस्सों को ध्यान से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि यह मध्यकालीन मस्जिद की स्थापत्य कला नहीं, बल्कि 11वीं सदी की भारतीय दुर्ग-निर्माण शैली का हिस्सा है। लाखन आर्मी का दावा है कि किले के मध्य में राजा कंसा के आराध्य भगवान शिव का एक अत्यंत प्राचीन मंदिर था और उसे विदेशी आक्रांताओं ने खंडित कर दिया था। पासी समाज के लोगों ने पुराने लखनऊ गजेटियर का हवाला देते हुए कहा है कि उसमें राजा कंसा और काकोरी-मलिहाबाद क्षेत्र पर उनके प्रभाव का उल्लेख है। ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि राजा कंसा ने सालार मसऊद गाजी के आक्रमण का प्रतिरोध किया था।

प्रशासन की सख्ती: बकरीद की नमाज से लेकर हनुमान चालीसा तक — सब पर रोक

बकरीद से पहले बढ़ते तनाव और कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए जिला प्रशासन ने विवादित स्थल पर सभी प्रकार की धार्मिक गतिविधियों पर अस्थायी रोक लगा दी। प्रशासन ने न केवल बकरीद की नमाज पर प्रतिबंध लगाया, बल्कि हिंदू पक्ष को भी सुंदरकांड पाठ, हनुमान चालीसा और अन्य धार्मिक आयोजन करने की अनुमति नहीं दी। तनाव बढ़ने की आशंका को देखते हुए प्रशासन ने मौके पर पर्याप्त पुलिस बल तैनात किया है। सीसीटीवी कैमरों की मदद से निगरानी की जा रही है और सोशल मीडिया पर भी पैनी नजर रखी जा रही है। पासी समाज से जुड़े कई संगठनों ने इस स्थल को संरक्षित घोषित किए जाने की माँग की है। उनका कहना है कि यह स्थान उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा हुआ है।

सपा सांसदों ने साधी चुप्पी — लाखन आर्मी भड़की

इस विवाद ने एक नया और दिलचस्प राजनीतिक मोड़ तब लिया जब लाखन आर्मी इस मुद्दे को संसद में उठवाने की माँग लेकर पासी समाज से आने वाले सपा सांसदों के दरवाजे पर पहुँची। मलिहाबाद के कसमंडी किले का विवाद अब तूल पकड़ता जा रहा है। नया मोड़ तब आया जब लाखन आर्मी इस मुद्दे को संसद में उठाने की माँग लेकर पासी समाज के सांसदों के आवास पर पहुँची, लेकिन समर्थन मांगने निकली लाखन आर्मी को समाजवादी पार्टी के सांसदों की प्रतिक्रिया रास नहीं आई। मोहनलालगंज से सपा सांसद आरके चौधरी के साथ लाखन आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सूरज पासी की तीखी बहस हुई। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन पहले ही दोनों पक्षों को किले के अंदर और आसपास किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधि करने से रोक चुका है, लेकिन अब इस विवाद में राजनीतिक प्रतिक्रिया, समर्थन जुटाने की कोशिश और जनप्रतिनिधियों पर बढ़ते दबाव ने इसे नई दिशा दे दी है।

भाजपा का हमला, अखिलेश की सधी चुप्पी

कसमंडी विवाद अब सपा और भाजपा के बीच सीधी सियासी टकराहट का मैदान बन गया है। भाजपा नेताओं ने अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पर तीखे हमले बोले हैं। उनका आरोप है कि सपा एक तरफ पासी समाज को अपना वोट बैंक मानती है, लेकिन जब उनके हितों की रक्षा की बात आती है तो पार्टी के सांसद मुँह फेर लेते हैं।भाजपा ने 2027 चुनाव के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपना चेहरा घोषित कर दिया है, जिससे पार्टी के भीतर चल रही तमाम अटकलों पर विराम लग गया है। इस पृष्ठभूमि में कसमंडी जैसे विवाद भाजपा के लिए पिछड़े-दलित वोटरों को साधने का अवसर बन गए हैं। दूसरी तरफ सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग का मुद्दा उठाते रहे हैं और उनका दावा है कि आने वाले चुनाव में पीडीए ही समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत बनेगा। लेकिन कसमंडी विवाद ने उनकी इस रणनीति पर सवालिया निशान लगा दिया है पासी समाज जो दलित वर्ग का हिस्सा है, वह सपा सांसदों की चुप्पी से नाराज है।

2027 चुनाव की राह में नया अवरोध

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाला विधानसभा चुनाव सपा के लिए काफी अहम माना जा रहा है। दस साल से सत्ता का वनवास झेल रहे सपा प्रमुख अखिलेश यादव 2027 में किसी तरह की कोई गलती नहीं करना चाह रहे हैं। ऐसे में कसमंडी विवाद अखिलेश के लिए दोधारी तलवार बन गई है। अगर वे पासी समाज का साथ देते हैं तो अल्पसंख्यक वोट बैंक नाराज होगा, और अगर चुप रहते हैं तो पासी-दलित मतदाता भाजपा की तरफ खिसक सकते हैं। यही वह राजनीतिक पेच है जिसे सुलझाने में अखिलेश अभी तक सफल नहीं हो पाए हैं।

पृष्ठभूमि: यूपी में मंदिर-मस्जिद विवादों की श्रृंखला

कसमंडी विवाद अकेला नहीं है। उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में ज्ञानवापी (वाराणसी), शाही ईदगाह (मथुरा), संभल और अब मलिहाबाद एक के बाद एक धार्मिक स्थलों को लेकर दावे-प्रतिदावे सामने आए हैं। पासी समाज के नेताओं ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर इस मामले में हस्तक्षेप की माँग की है और आधिकारिक जाँच की अपील की है।

आगे क्या?

फिलहाल विवादित स्थल पर प्रशासन का सख्त पहरा है। दोनों पक्षों को लिखित सूचना दी जा चुकी है। मामला अदालत तक जा सकता है और पुरातत्व सर्वेक्षण की माँग भी उठ रही है। लेकिन जिस तरह यह विवाद राजनीतिक रंग पकड़ चुका है, उसे देखते हुए सहज समाधान की राह आसान नहीं दिखती।

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