145 साल के इतिहास में पहली बार, सेंट स्टीफेंस की कमान संभालेंगी महिला प्राचार्य, विरोध को दरकिनार कर प्रो. सुज़न एलियस ने संभाला पदभार

दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफेंस कॉलेज ने रविवार को अपने 145 वर्षों के इतिहास में पहली बार किसी महिला को प्राचार्य पद सौंपा। प्रोफेसर सुज़न एलियस ने 1 जून 2026 से कॉलेज के 14वें प्राचार्य और पहली महिला प्राचार्य के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। यह नियुक्ति तब हुई जब दिल्ली विश्वविद्यालय ने चयन प्रक्रिया पर गंभीर आपत्तियाँ जताते हुए इसे रोकने का आदेश दे रखा था, लेकिन कॉलेज ने अपनी अल्पसंख्यक संस्था की स्वायत्तता का हवाला देते हुए इसे नजरअंदाज कर दिया।

ऐतिहासिक नियुक्ति, ऐतिहासिक विवाद

कॉलेज की सर्वोच्च परिषद (Supreme Council) की ओर से जारी आधिकारिक अधिसूचना में कहा गया: “सुप्रीम काउंसिल यह घोषणा करते हुए प्रसन्न है कि प्रो. सुज़न एलियस कॉलेज की 14वीं प्राचार्य और पहली महिला प्राचार्य के रूप में 1 जून 2026 से पदभार ग्रहण करेंगी।” यह अधिसूचना दिल्ली के बिशप और कॉलेज अध्यक्ष रेव्हरेंड डॉ. पॉल स्वरूप द्वारा हस्ताक्षरित थी।1881 में स्थापित सेंट स्टीफेंस कॉलेज देश के सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में से एक है और अपनी दीर्घकालिक शैक्षणिक विरासत के लिए जाना जाता है। प्रो. एलियस की नियुक्ति को कॉलेज के लिए एक प्रतीकात्मक और ऐतिहासिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ प्राचार्य का पद हमेशा पुरुषों के पास रहा।

कौन हैं प्रो. सुज़न एलियस?

प्रो. एलियस एक कंप्यूटर वैज्ञानिक हैं जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डीप टेक्नोलॉजी शोध में विशेषज्ञता रखती हैं। उन्होंने हाल ही में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी (उत्तर प्रदेश) में जनवरी से मई 2026 तक प्रो वाइस चांसलर (शोध) के रूप में कार्य किया। उनका शैक्षणिक करियर 34 वर्षों से अधिक का है, जिसमें वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (VIT) में प्रोफेसर व डीन, और हिंदुस्तान यूनिवर्सिटी में रिसर्च डायरेक्टर जैसे महत्वपूर्ण पद शामिल हैं। अपने पदभार ग्रहण के बाद दिए साक्षात्कारों में प्रो. एलियस ने उदार कला शिक्षा को अत्याधुनिक तकनीक से जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना रेखांकित की है।

DU का विरोध और UGC का दरवाज़ा खटखटाना

प्रो. एलियस के चयन के कुछ ही दिनों के भीतर दिल्ली विश्वविद्यालय ने उनकी नियुक्ति पर रोक लगाने का आदेश दिया, जिसमें यूजीसी विनियम 2018 का पालन न करने का हवाला दिया गया। DU ने UGC को भी पत्र लिखकर हस्तक्षेप की माँग की। 14 मई के एक निर्देश में रजिस्ट्रार विकास गुप्ता ने आरोप लगाया कि चयन समिति में उपकुलपति और उच्च शिक्षा विशेषज्ञों के अनिवार्य नामितों को शामिल नहीं किया गया। विश्वविद्यालय का तर्क था कि चूँकि सेंट स्टीफेंस एक केंद्र-पोषित कॉलेज है, इसलिए चयन पैनल में विश्वविद्यालय द्वारा नामित उच्च शिक्षा विशेषज्ञ और उपकुलपति का प्रतिनिधि होना अनिवार्य था।

कॉलेज का पलटवार — अल्पसंख्यक दर्जे का हथियार

कॉलेज के सूत्रों ने पुष्टि की कि संस्था अपने अल्पसंख्यक दर्जे का हवाला देते हुए विश्वविद्यालय की आपत्तियों को दरकिनार कर रही है। DU की स्थिति यह है कि UGC विनियम अल्पसंख्यक दर्जे की परवाह किए बिना सभी पर समान रूप से लागू होते हैं। कॉलेज का पक्ष, 2008 के उच्च न्यायालय के निर्णय द्वारा समर्थित, यह है कि उसका अल्पसंख्यक दर्जा उसे चयन समिति की संरचना को नियंत्रित करने वाले विशेष अध्यादेश प्रावधानों से मुक्त करता है।कॉलेज के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न उजागर करने की शर्त पर कहा: “विश्वविद्यालय ने वर्गीस के दूसरे कार्यकाल को भी मान्यता देने से इनकार किया था, लेकिन वे प्राचार्य बने रहे। इसी तरह, एलियस भी पदभार संभालेंगी।”

पुराने विवाद की नई कड़ी

यह विकास DU और सेंट स्टीफेंस के बीच पहले से चले आ रहे विवाद को फिर से जीवित कर देता है, जिसमें पूर्व प्राचार्य जॉन वर्गीस के दूसरे कार्यकाल की मान्यता को लेकर जारी अदालती मामला भी शामिल है, जो फरवरी 2026 में समाप्त हुआ। हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक अलग मामले में सेंट स्टीफेंस में भर्ती प्रक्रिया पर भी रोक लगा दी, क्योंकि तदर्थ शिक्षकों ने अनियमितताओं का आरोप लगाया था। व्यावहारिक रूप से, यह स्थिति ‘थम्पु प्रकरण’ जैसी हो सकती है, जहाँ नियुक्त प्राचार्य ने कार्यभार संभाला, वेतन शुरुआत में कॉलेज के निजी कोष से प्रबंधित किया गया, और विश्वविद्यालय की औपचारिक मान्यता काफी बाद में मिली।

एक समानांतर प्रकरण — मुंबई में भी यही हाल

यह एकमात्र मामला नहीं है। भारत के दो सबसे प्रतिष्ठित अल्पसंख्यक संस्थानों दिल्ली के सेंट स्टीफेंस और मुंबई के सेंट जेवियर्स ने 2025-26 में महिला प्राचार्यों की नियुक्ति की। लेकिन प्रो. सुज़न एलियस और डॉ. करुणा गोकर्ण दोनों को ही क्रमशः DU और मुंबई विश्वविद्यालय की प्रक्रियागत चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इन समानांतर घटनाओं ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है क्या यह महज नियामक विवाद है, या कुछ और?

ऐतिहासिक महत्व

सेंट स्टीफेंस की स्थापना 1881 में हुई थी, और यह 1975 तक महिलाओं को प्रवेश ही नहीं देता था। इस पृष्ठभूमि में एलियस की नियुक्ति एक मील का पत्थर है।कॉलेज में विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच इस नियुक्ति को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं हैं, जहाँ एक वर्ग इसे ऐतिहासिक बदलाव मान रहा है, वहीं दूसरा वर्ग DU की प्रक्रियागत आपत्तियों को उचित ठहरा रहा है। अब सभी की नज़रें इस पर हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय और UGC आगे क्या कदम उठाते हैं, और क्या यह मामला न्यायालय तक पहुँचता है।

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