पं. दीनदयाल उपाध्याय से नोएडा तक, मुफ्त शौचालय बंद, आम जनता परेशान

निशुल्क मूत्रालय पर चला हथड़ा — विकास की आड़ में जनसुविधा की बल?

पूर्व मध्य रलवे के सबसे व्यस्त और ऐतिहासिक स्टशनों में शुमार पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन (पूर्व मुगलसराय) के बाहर लगे निशुल्क मूत्रालय को तोड़े जाने की घटना ने नई बहस छेड़ दी है। स्थानीय लोगों और यात्रियों में ख़ास करके कविताओं की जगत में अपने नाम का शोहरत फैलाए हुए दमदार बनारसी भी अपने यूट्यूब चैनल पर प्रमुखता से उठा रहे और बता रहे है कि सरकार के इस कदम को लेकर गहरा आक्रोश है। सवाल उठ रहा है कि जब एटीएम मशनें, चेक पोस्ट और अन्य व्यावसायिक ढाँचे सुरक्षित है , तो केवल जनता की मुफ्त सुविधा पर ही हथौड़ा क्यों चलाया गया?

ग्राउंड रिपोर्ट: टूटा मूत्रालय, बढ़ती गदगी

स्टेशन के बाहर परिसर में स्थित निशुल्क मूत्रालय को हाल ही में ध्वस्त कर दिया गया। इस मूत्रालय का उपयोग प्रतिदिन सैकड़ों यात्री, रिक्शा चालक, ठेले वाले और स्थानीय निवासी करते थे। इसके टूटने के बाद से स्टेशन के आसपास खुले में शौच और मूत्र की समस्या एक बार फिर सिर उठाने लगी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अब उन्हें या तो दूर जाना पड़ता है या फिर पैसे देकर पेड टॉयलेट का इस्तेमाल करना पड़ता है। पं. दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन पूर्व मध्य रेलवे के सबसे व्यस्त एव प्रमुख स्टेशनों में गिना जाता है और एशिया के सबसे बड़े रेलवे मार्शलिग यार्डों में से एक यही स्थित है। ऐसे महत्वपूर्ण जक्शन पर जन-सुविधाओं का टूटना और उसे न बदला जाना, सीधे तौर पर जनता की बुनियादी जरूरतों की अनदेखी है।

मुंबई से मुगलसराय तक: निशुल्क मूत्रालय की जगह पेड सिस्टम का खेल

यह समस्या सिर्फ मुगलसराय तक सीमित नहीं है। देश के कई बड़े शहरों में यही हाल है। मुंबई में बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के सार्वजनिक शौचालय, जो नागरिकों को निशुल्क उपलब्ध कराए जाने चाहिए, उन्हें ठेकेदार पेड सुविधा में बदल कर शुल्क ले रहे हैं यह BMC के अपने नियमों का खुला उल्लंघन है। जाँचकर्ताओं ने पाया कि महिलाओं से खासतौर पर अनुचित शुल्क वसूला जा रहा है, जबकि प्राधिकरण मूकदर्शक बना हुआ है। ऐसे में यह साफ होता है कि जहाँ मुफ्त सुविधाएँ नहीं तोड़ी जा रहीं, वहाँ उन्हें चुपचप ‘पेड’ में बदला जा रहा है।

नोएडा-ग्रेटर नोएडा: सैकड़ों शौचालय बंद, प्राधिकरण बेपरवाह

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भी स्थिति बेहद चिंताजनक है। नोएडा में करीब 260 सार्वजनिक शौचालय बंद और बदहाल पड़े थे, जिनके रखरखाव के लिए प्राधिकरण को अंतत बिल्ट ऑपरेट ट्रांसफर (BOT) मॉडल के तहत तीन निजी एजेंसियों का चयन करना पड़ा। नोएडा प्राधिकरण के जीएम एसपी सिंह ने दावा किया कि 150 सर्वजनिक शौचालयों का संचालन अगले 10 दिनों में शुरू कर दिया जाएगा और चनी गई एजेंसी अगले 10 साल तक इनके रखरखाव की जिम्मेदारी संभालगी। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि शौचालय की देखरेख व संचालन का जिम्मा निजी एजेंसियों को सौंपा गया है, और अब एजेंसी की जम्मेदारी है कि वह सार्वजनिक शौचालय खुलवाए, टूटे-फूटे सुधारे और सविधाओं के साथ संचालन करवाए। इस प्रक्रिया में जनता को महीनों परेशान उठानी पड़ी।

‘स्वच्छ भारत’ के नारे और जमीनी हकीकत में खाई

विशषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक स्वच्छता प्रणाली की आमूल समीक्षा जरूरी है हर सुविधा केंद्र पर स्पष्ट और मानकीकृत शुल्क सूची प्रदर्शित होनी चाहिए और नियम तोड़ने वाले ठेकेदारों के अनुबंध तत्काल रद्द किए जाने चाहिए। स्वच्छ भारत अभियान के तहत देश में करोड़ों शौचालय बनाए गए, लेकिन उनके रखरखाव की जिम्मेदारी न सरकार लेती है, न निजी एजेंसियाँ ढंग से निभाती हैं। जो मुफ्त में बना, उसे या तो तोड़ा जा रहा है, या बंद रखा जा रहा है, या चुपचाप पेड में बदला जा रहा है।

जनता के सवाल जो जवाब माँगते हैं

स्थानीय नागरिकों और समाजसेवियों ने कई तीखे सवाल उठाए हैं, जब स्टेशन परिसर में ATM, पार्किंग और दुकानों की सुरक्षा सुनिश्चित है, तो निशुल्क मूत्रालय को क्यों तोड़ा गया?, क्या यह कदम किसी ‘पेड यूज़’ व्यवस्था को थोपने की तैयारी है?, विकास के नाम पर जनसुविधाए छीनना कहाँ तक उचत है?, रेलवे प्रशासन और स्थानीय नगर निकायों की जवाबदेही कौन तय करेगा?

विशेषज्ञों की राय

स्वच्छता और नागरिक अधिकारों पर काम करने वाले जानकारों का कहना है कि सर्वजनिक मूत्रालय और शौचालय महज एक सुविधा नहीं, बल्कि नागरिकों का मौलिक अधिकार है। इनका टूटना या बंद होना सीधे तौर पर खुले में मूत्र और शौच को बढ़ावा देता है, जिससे संक्रामक बीमारियां फैलती हैं, महिलाओं की सुरक्षा खतरे में पड़ती है और पर्यावरण प्रदूषित होता है।

रलवे और प्रशासन की चुप्पी

इस मामले में पर्व मध्य रेलवे के अधिकारियों से जब प्रतिक्रिया माँगी गई तो कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। स्थानीय नगर पालिका भी जम्मेदारी से बचती नजर आई। यह मामला रेलवे और नगर निकाय के बीच ‘जिम्मेदारी की लुकाछिपी’ का एक और उदाहरण बनकर सामने आया है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन पर निशुल्क मूत्रालय तोड़ने की घटना एक छोटी सी खबर नहीं, बल्कि देश की उस बड़ी समस्या का प्रतिबिंब है जहाँ ‘विकास’ के नाम पर गरीब और आम आदमी की बुनियादी जरूरतें पीछे धकेल दी जाती हैं। जरूरत है कि रेलवे प्रशासन और स्थानीय निकाय मिलकर न केवल इस मूत्रालय को पुनर्स्थापित करें, बल्कि पूरे देश में सार्वजनिक स्वच्छता सुविधाओं की समयबद्ध समीक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित करें।

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