5 साल का कार्यकाल आज हुआ समाप्त, लेकिन प्रधानजी की कुर्सी बरकरार OBC आयोग की रिपोर्ट और विधानसभा चुनाव बने देरी की बड़ी वजह
उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज एक ऐतिहासिक दिन दर्ज हो गया। प्रदेश की 57,695 ग्राम पंचायतों के मौजूदा ग्राम प्रधानों का पाँच वर्षीय कार्यकाल आज 26 मई को समाप्त हो रहा है। लेकिन इस बार न तो किसी सरकारी बाबू को गाँव की कमान सौंपी गई और न ही प्रधानजी की कुर्सी खाली हुई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पंचायती राज विभाग के उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है जिसके तहत मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक के रूप में काम सौंपा जाएगा। यह फैसला उत्तर प्रदेश के पंचायती राज इतिहास में अपनी तरह का पहला है। इससे पहले तक परंपरा यह थी कि कार्यकाल समाप्त होने पर ADO पंचायत को प्रशासक बनाया जाता था, लेकिन इस बार सरकार ने ADO पंचायत की जगह अलग प्रशासक की नियुक्ति का निर्णय लिया और वह प्रशासक कोई अफसर नहीं, बल्कि स्वयं ग्राम प्रधान ही हैं।
6 महीने की व्यवस्था, पर बढ़ सकती है अवधि
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव न होने के कारण प्रदेश सरकार ने ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 6 महीने के लिए बढ़ा दिया है।  यानी अब 26 नवंबर 2026 तक ये प्रधान प्रशासक के रूप में अपनी ग्राम पंचायतों का संचालन करते रहेंगे। लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह अवधि और आगे खिंच सकती है। प्रदेश सरकार अब पंचायत चुनाव को आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद कराने पर गंभीरता से विचार कर रही है।
OBC आयोग चुनाव टलने की असली वजह
पंचायत चुनाव में इस देरी की सबसे बड़ी वजह है ओबीसी आरक्षण का उलझा हुआ मसला। उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर योगी सरकार ने कानूनी विवादों से बचने के लिए ‘समर्पित राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग’ का गठन किया है। इस आयोग के अध्यक्ष इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज राम औतार सिंह को बनाया गया है। पाँच सदस्यीय इस आयोग में दो सेवानिवृत्त जज और दो सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी भी शामिल हैं। आयोग की जिम्मेदारी पूरे राज्य में सर्वे कर ओबीसी आरक्षण का वास्तविक आंकड़ा तैयार करना है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि सर्वे, रिपोर्ट और अंतिम आरक्षण सूची तैयार होने में करीब 5 से 7 महीने का समय लग सकता है इसके बाद ही राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव की आधिकारिक तारीखों की घोषणा करेगा। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के “ट्रिपल टेस्ट” के निर्देश के बाद बिना ओबीसी आरक्षण का गणितीय आधार तय किए चुनाव कराना कानूनी रूप से संभव नहीं है। पहले भी यूपी सरकार को इसी कारण अदालत में झटका लग चुका है।
राजनीतिक समीकरण विधानसभा का साया
राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में सरकार ग्राम स्तर पर कोई बड़ा फैसला लेने से बच रही है और ग्राम प्रधान को ही प्रशासक नियुक्त करने का फैसला किया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह निर्णय विशुद्ध चुनावी गणित से प्रेरित है प्रदेश के करीब 58 हजार ग्राम प्रधान और उनसे जुड़ा विशाल मतदाता वर्ग सत्तापक्ष को नाराज़ करना नहीं चाहता। उत्तराखंड और राजस्थान में भी इसी तर्ज पर प्रधानों को प्रशासक बनाया जा चुका है।
प्रधानों को मिलेगा लगभग 6 साल का कार्यकाल
यदि पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव के बाद 2027 के मध्य या अंत में होते हैं, तो इस बार के ग्राम प्रधानों का वास्तविक कार्यकाल चुने जाने से लेकर लगभग 6 से 6.5 वर्ष का हो जाएगा। यह भारतीय पंचायती राज व्यवस्था में एक असाधारण स्थिति होगी।
विपक्ष का सवाल
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यह संविधान की पंचायती राज भावना के विरुद्ध है। विपक्ष का तर्क है कि जनता ने जिन्हें 5 साल के लिए चुना था, उन्हें बिना नए जनादेश के आगे बनाए रखना लोकतंत्र की मूल भावना से खिलवाड़ है।
गाँव के विकास पर क्या होगा असर?
सरकार का तर्क है कि यदि बाहरी प्रशासक नियुक्त किए जाते, तो विकास कार्यों में रुकावट आती। प्रधानों के पास पहले से गाँव की ज़रूरतों की जानकारी है, इसलिए वे बेहतर तरीके से काम कर सकते हैं। हालाँकि, विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ज़िला प्रशासन की निगरानी आवश्यक रहेगी। आज से उत्तर प्रदेश के गाँवों में वही नेतृत्व जारी रहेगा लेकिन अब “प्रधान” की बजाय “प्रशासक” के रूप में। असली परीक्षा यह होगी कि अगले 6 महीनों में OBC आयोग अपना काम पूरा कर पाता है या नहीं और क्या यूपी में पंचायत चुनाव 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हो पाएंगे?
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