“जमानत नियम है, जेल अपवाद”, सुप्रीम कोर्ट ने UAPA में भी माना, उमर खालिद को बेल न देने वाले अपने ही फैसले पर उठाए गंभीर सवाल

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा कि गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) जैसे सख्त कानूनों के तहत दर्ज मामलों में भी “जमानत नियम है और जेल अपवाद।” न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने दिल्ली दंगा साजिश मामले में कार्यकर्ता उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करने वाले सुप्रीम कोर्ट के अपने ही पुराने फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई।

किस मामले में आई यह टिप्पणी?

यह अहम टिप्पणी तब आई जब पीठ जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के हंडवाड़ा निवासी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अंद्राबी को NIA ने नार्को-आतंकवाद के एक मामले में 11 जून 2020 को गिरफ्तार किया था और वह तब से जेल में हैं।  खास बात यह है कि उनके पास से सीधे तौर पर कोई नारकोटिक पदार्थ नहीं मिले थे। जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 19 अगस्त 2025 को उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने माना था कि अंद्राबी लगभग पाँच साल से हिरासत में हैं, लेकिन आरोपों की गंभीरता और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री जमानत देने के पक्ष में नहीं है। इसके बाद अंद्राबी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

पीठ ने स्पष्ट किया “UAPA की धारा 43D(5) की वैधानिक बाधा एक सीमित प्रतिबंध के रूप में ही काम करती है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 की गारंटी के अधीन है। इसलिए हमें इसमें कोई संदेह नहीं कि UAPA के तहत भी जमानत नियम है और जेल अपवाद।” कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि केवल प्रारंभिक आरोपों के आधार पर जमानत से लगातार इनकार किया जाता रहा, तो यह विचाराधीन हिरासत को सजा में बदल सकता है, जो संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ होगा।  कोर्ट ने यह भी कहा — “आदर्श रूप से, जितने गंभीर आरोप हों, उतनी ही त्वरित गति से ट्रायल होना चाहिए।”

उमर खालिद मामले में अपने ही फैसले पर सवाल

2021 में केंद्र सरकार बनाम के.ए. नजीब मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि ट्रायल में देरी UAPA के तहत दर्ज मामलों में भी जमानत का आधार बन सकती है। लेकिन इसी साल जनवरी में जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने उमर खालिद और शरजील इमाम को यह कहते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया था कि सिर्फ जेल में लंबे वक्त तक रहने से कोई जमानत का हकदार नहीं हो जाता।  अब न्यायमूर्ति नागरत्ना की पीठ ने “गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य” मामले (जिसमें उमर खालिद का बेल मामला भी शामिल था) पर गंभीर आपत्ति जताई। पीठ ने कहा — “हमें गुलफिशा फातिमा मामले में दिए गए फैसले पर गंभीर आपत्तियाँ हैं।” न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने कहा — “वे बाध्यकारी मिसाल को कमजोर नहीं कर सकते, उसकी अनदेखी नहीं कर सकते।”  कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर किसी छोटी बेंच को बड़ी बेंच के फैसले से असहमति हो, तो वह उसे नजरअंदाज नहीं कर सकती — बल्कि उसे मामला भारत के प्रधान न्यायाधीश के पास बड़ी बेंच के गठन के लिए भेजना होगा।

उमर खालिद — पाँच साल से जेल में, अब तक ट्रायल नहीं

उमर खालिद और शरजील इमाम साल 2020 से तिहाड़ जेल में बंद हैं। उन पर दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश रचने का आरोप है और उन्हें UAPA की धाराओं समेत कई अन्य धाराओं में गिरफ्तार किया गया है।  5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी, हालाँकि उसी मामले में पाँच अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद  को जमानत दे दी गई थी।  कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए जमानत मांगने का एक विकल्प खुला रखा — वे या तो संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने के बाद, या 5 जनवरी 2026 के आदेश के एक साल बाद फिर से जमानत के लिए अर्जी दे सकते हैं। अप्रैल 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद की पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी थी और कहा था कि 5 जनवरी 2026 के फैसले की समीक्षा का कोई ठोस आधार नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी जिसमें 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। उमर खालिद और शरजील इमाम पर इस दंगे की “बड़ी साजिश” में शामिल होने का आरोप है।

क्या है इस फैसले का महत्त्व?

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का व्यापक असर हो सकता है। अदालत ने कहा है कि UAPA की धारा 43D(5) को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के साथ संतुलित तरीके से लागू किया जाना चाहिए। यह टिप्पणी उन सैकड़ों विचाराधीन कैदियों के लिए उम्मीद की किरण बन सकती है जो UAPA जैसे कठोर कानूनों के तहत वर्षों से बिना ट्रायल के जेलों में बंद हैं।अदालत ने न्यायिक अनुशासन पर भी जोर देते हुए कहा — “न्यायिक अनुशासन और निश्चितता के लिए यह जरूरी है कि छोटी बेंचें बड़ी बेंचों के फैसलों का सम्मान करें और उनका पालन करें।” यह मामला अब न केवल उमर खालिद की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न बन चुका है, बल्कि यह भारत में आतंक-विरोधी कानूनों और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की बड़ी बहस का केंद्र भी बन गया है।

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