पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अचानक हुई बढ़ोतरी के बाद देश भर के गिग वर्करों का गुस्सा फूट पड़ा। शनिवार, 16 मई को ‘गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन’ (GIPSWU) के आह्वान पर लाखों डिलीवरी पार्टनर्स और कैब ड्राइवरों ने दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक पाँच घंटे की सांकेतिक हड़ताल की। इस दौरान जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट और जेप्टो जैसे ऑनलाइन डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स के ऐप बंद रहे और दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, बेंगलुरू, मुंबई, पुणे समेत तमाम बड़े शहरों में ऑर्डर डिलीवरी पूरी तरह ठप हो गई।
तेल की आग, जेब पर भारी
यूनियन के पदाधिकारियों के अनुसार, तेल विपणन कंपनियों द्वारा हाल ही में पेट्रोल और डीजल के दामों में लगभग ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी इस आक्रोश की मुख्य वजह है — करीब चार वर्षों के अंतराल में हुई यह सबसे बड़ी तेल वृद्धि है। ईंधन, गाड़ी की सर्विसिंग और रखरखाव का खर्च लगातार बढ़ रहा है, लेकिन कंपनियाँ उस अनुपात में भुगतान नहीं बढ़ा रही हैं। इसके चलते डिलीवरी पार्टनर्स को हर दिन भारी ट्रैफिक और खराब मौसम के बीच 10 से 14 घंटे तक काम करना पड़ रहा है।
नोएडा में उबला गुस्सा — “लिफ्ट तक नहीं मिलती”
नोएडा में ऑनलाइन फूड डिलीवरी करने वाले राइडरों ने खुलकर अपनी पीड़ा बयान की। उन्होंने बताया कि महंगाई की मार के साथ-साथ उन्हें काम के दौरान अपमानजनक परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ता है। “चार-चार मंजिल सीढ़ियाँ चढ़कर डिलीवरी करनी पड़ती है, लिफ्ट का इस्तेमाल तक नहीं करने दिया जाता। डिलीवरी स्टोर पर भी राइडर के साथ बदसलूकी होती है। इतनी महंगाई में घर चलाना मुश्किल हो गया है” — यह दर्द था उन हजारों राइडरों का जो रोज़ सड़क पर पसीना बहाते हैं।
यूनियन की तीन बड़ी माँगें
GIPSWU ने सरकार और स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट जैसी कंपनियों से माँग की है कि डिलीवरी और ट्रांसपोर्ट वर्कर्स के लिए न्यूनतम ₹20 रुपए प्रति किलोमीटर सेवा दर तय की जाए। साथ ही यूनियन ने पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के अनुपात में कंपनियों की ओर से अलग से ईंधन भत्ता (Fuel Compensation) देने की माँग भी उठाई है। GIPSWU की राष्ट्रीय अध्यक्ष सीमा सिंह ने कहा कि यह पूरा कार्यबल इस समय देश के कई हिस्सों में चल रही भीषण गर्मी और हीटवेव के बीच 12 से 14 घंटे काम कर रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि तकनीकी कंपनियों और सरकार ने तत्काल न्यूनतम किराए में संशोधन नहीं किया, तो यह आंदोलन अनिश्चितकालीन हड़ताल में बदल सकता है।
1.2 करोड़ वर्कर्स, बड़ा संकट
GIPSWU के नेशनल कोऑर्डिनेटर निर्मल गोराना के अनुसार, देश के लगभग 60 करोड़ असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों में से करीब 1.2 करोड़ लोग गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर हैं, जो अपनी बाइक या स्कूटर के दम पर रोज़ की कमाई करते हैं। नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2020-21 में इनकी संख्या 77 लाख थी, जो 2029-30 तक 2.3 करोड़ के पार जाने का अनुमान है — ऐसे में इनकी हड़ताल देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दे सकती है। इससे पहले दिसंबर 2025 में भी 10-मिनट की असुरक्षित डिलीवरी प्रणाली और गिरते इंसेंटिव को लेकर बड़ा प्रदर्शन हुआ था। लेकिन इस बार की हड़ताल की आँच कहीं अधिक तेज़ है।
आगे क्या?
गिग वर्कर्स का कहना है कि इस अस्थायी हड़ताल का उद्देश्य सरकार और ऐप कंपनियों तक यह संदेश पहुँचाना है कि बढ़ती महंगाई और कम भुगतान के बीच परिवार चलाना मुश्किल होता जा रहा है — और अगर जल्द राहत नहीं मिली, तो आने वाले दिनों में बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा। अब सवाल यह है कि क्या सरकार और कंपनियाँ इन करोड़ों कामगारों की पुकार सुनेंगी, या फिर यह चिंगारी एक बड़े जनांदोलन की लौ बनेगी?

