दिल्ली की बहुचर्चित आबकारी नीति घोटाले से जुड़े सीबीआई मामले ने एक नया और निर्णायक मोड़ ले लिया है। दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने 14 मई 2026 को आम आदमी पार्टी के नेताओं अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, दुर्गेश पाठक, संजय सिंह, विनय मिश्रा और सौरभ भारद्वाज के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के बाद खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया। अब यह संवेदनशील मामला जस्टिस मनोज जैन की पीठ के सामने सूचीबद्ध होने वाला है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला 2021-22 की दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति से जुड़ा है, जिसे AAP सरकार ने लागू किया था, लेकिन भ्रष्टाचार और रिश्वत के आरोपों के बीच जुलाई 2022 में ही रद्द कर दिया गया। 27 फरवरी 2026 को स्पेशल जज जितेंद्र सिंह की अदालत ने 598 पेज के आदेश में सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया था, और कहा था कि सीबीआई का केस पूर्व नियोजित और बनावटी है। सीबीआई ने अपनी 974 पेज की याचिका में निचली अदालत के फैसले को चौंकाने वाला और गैरकानूनी करार दिया और दावा किया कि ट्रायल कोर्ट ने महत्वपूर्ण सबूतों को नजरअंदाज किया।
विवाद की जड़ — जज बदलने की मांग और बहिष्कार
केजरीवाल, सिसोदिया और अन्य आरोपियों ने पक्षपात की आशंका जताते हुए जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से स्वयं को मामले से अलग करने का अनुरोध किया था। उनका कहना था कि जज के बच्चे केंद्र सरकार के पैनल वकील के रूप में सूचीबद्ध हैं और उन्हें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से केस आवंटित होते हैं — जो इसी मामले में सीबीआई की पैरवी करते हैं। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने 20 अप्रैल 2026 को इस रिक्यूजल याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि न्यायाधीशों का बार एसोसिएशन के कार्यक्रमों में बतौर वक्ता या मुख्य अतिथि जाना एक पेशेवर जिम्मेदारी है, इसे राजनीतिक या वैचारिक झुकाव के रूप में देखना गलत है। इसके बाद केजरीवाल और सिसोदिया ने जज को पत्र लिखकर कहा कि वे न तो व्यक्तिगत रूप से और न ही वकील के माध्यम से आगे इस पीठ के समक्ष पेश होंगे। सिसोदिया ने महात्मा गांधी की सत्याग्रह की शिक्षाओं का हवाला देते हुए इस फैसले को उचित ठहराया।
अवमानना की कार्रवाई और केस का ट्रांसफर
14 मई 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट में एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक नाटकीय घटनाक्रम सामने आया। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि कुछ पक्षों द्वारा सोशल मीडिया और सार्वजनिक बयानों के जरिए न्यायपालिका को निशाना बनाया जा रहा है, जो बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि वह AAP नेताओं की मांग पर रिक्यूज नहीं हो रही हैं, बल्कि चूँकि कानून के तहत एक जज जिस मामले में अवमानना की कार्यवाही शुरू करे, वह उसी मामले की मुख्य सुनवाई जारी नहीं रख सकता, इसलिए वह इसे मुख्य न्यायाधीश के पास स्थानांतरण के लिए भेज रही हैं। अदालत ने निर्देश दिया कि मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए और इसे किसी अन्य पीठ को सौंपा जाए, जबकि अवमानना की कार्यवाही कानून के अनुसार अलग से जारी रहेगी।
अब क्या होगा?
मामला अब जस्टिस मनोज जैन की पीठ के सामने सुनवाई के लिए आने वाला है। इस नई पीठ को न केवल सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई नए सिरे से शुरू करनी होगी, बल्कि यह भी तय करना होगा कि क्या ट्रायल कोर्ट का वह फैसला, जिसमें केजरीवाल समेत 23 आरोपियों को बरी किया गया था, न्यायिक जाँच पर खरा उतरता है या नहीं। गौरतलब है कि 27 फरवरी 2026 को ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में केजरीवाल, सिसोदिया, के. कविता और अन्य आरोपियों को आरोपमुक्त किया था। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने सुनवाई का बहिष्कार जारी रखा था, जिसके चलते कोर्ट ने उनके लिए एमिक्स क्यूरी (न्यायालय सहायक) नियुक्त करने का भी निर्णय किया था।
केजरीवाल की प्रतिक्रिया
जस्टिस शर्मा के मामले से अलग होने के बाद अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर लिखा — “सत्य की जीत हुई। गांधी जी के सत्याग्रह की एक बार फिर जीत हुई।” यह मामला अब जस्टिस मनोज जैन की अदालत में आने से एक नए अध्याय की शुरुआत होगी। राजनीतिक और कानूनी दोनों नजरिए से यह देश के सबसे चर्चित मुकदमों में से एक बना हुआ है। अगली सुनवाई की तारीख जल्द ही तय होने की उम्मीद है।
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