हाईकोर्ट की सख्ती के बाद सरकार ने उठाया बड़ा कदम; 75 जिलों में रैपिड सर्वे के बाद ही होगा ओबीसी कोटे का निर्धारण, उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सोमवार को एक अहम फ़ैसला लेते हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण को निर्धारित करने के लिए ‘समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग’ (Dedicated OBC Commission) के गठन को कैबिनेट की मंजूरी दे दी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में राज्य ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करने का प्रस्ताव पेश किया गया और उसे हरी झंडी दी गई। इस फैसले के साथ ही यह भी लगभग तय हो गया है कि प्रदेश में पंचायत चुनाव अब समय पर नहीं हो पाएंगे। चुनाव तभी होंगे जब नया आयोग पूरे प्रदेश में सर्वे करके अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपेगा।
क्यों पड़ी नए आयोग की जरूरत?
यूपी में मौजूदा ओबीसी आयोग का कार्यकाल अक्टूबर 2025 में समाप्त हो गया था, जिसे सरकार ने अक्टूबर 2026 तक बढ़ा तो दिया, लेकिन कानूनी रूप से उसके पास समर्पित आयोग के अधिकार नहीं थे — इसी पर सवाल उठे थे। इसी कानूनी स्थिति को देखते हुए सरकार ने नया आयोग गठित करने का निर्णय लिया है। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच तक पहुंचा, जहाँ जस्टिस राजन राय और जस्टिस अवधेश चौधरी की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर मौजूदा पिछड़ा वर्ग आयोग के अधिकारों को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट के सख्त तेवर अपनाए जाने के बाद ही योगी सरकार इस दिशा में आगे बढ़ी।
ट्रिपल टेस्ट — सुप्रीम कोर्ट का अनिवार्य निर्देश
सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं कि किसी भी स्थानीय निकाय या पंचायत चुनाव से पहले तीन साल के कार्यकाल वाला पिछड़ा वर्ग आयोग या समर्पित आयोग होना अनिवार्य है। इसी ‘ट्रिपल टेस्ट’ फॉर्मूले के तहत आयोग को पहले ओबीसी वर्ग की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का गहन आकलन करना होगा, उसके बाद ही आरक्षण का स्वरूप तय होगा। ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही पंचायत चुनावों में पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का स्वरूप तय होगा। ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण पहले से ही निर्धारित है। इसके अलावा कौन सी सीट आरक्षित करनी है और कौन सी नहीं, यह भी इसी प्रक्रिया से तय होगा।
सर्वे में लगेंगे महीनों, चुनाव तारीखें अभी दूर
आयोग के गठन के तुरंत बाद चुनाव नहीं कराए जा सकते। समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग को उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों के गांवों में जाकर ओबीसी आबादी का आनुपातिक डेटा और उनके पिछड़ेपन की स्थिति का सर्वे करना होगा। इस व्यापक सर्वे और रिपोर्ट तैयार करने में कम से कम 2 से 3 महीने का समय लग सकता है। ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पंचायत चुनाव में आरक्षण की जो सिफारिशें आएंगी, उस पर राजनीतिक दलों और संबंधित पक्षों से आपत्तियां मांगी जाएंगी और उनके निस्तारण में भी एक महीने का वक्त लग सकता है। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में अभी पंचायत चुनाव के लिए मतदाता सूची भी तैयार नहीं हो पाई है। राज्य निर्वाचन आयोग ने 10 जून तक फाइनल वोटर लिस्ट तैयार करने की समय-सीमा तय की है।
तो फिर कब होंगे चुनाव?
राजनीतिक विश्लेषकों और सूत्रों के अनुसार कई मोर्चों पर अड़चनें हैं। वर्तमान समय में राज्य का पूरा प्रशासनिक अमला और सरकारी कर्मचारी राष्ट्रीय जनगणना के कार्य में व्यस्त हैं — ग्रामीण क्षेत्रों के लेखपाल, सचिव, शिक्षक और अन्य सरकारी कर्मचारी इस महा-सर्वेक्षण के काम में ड्यूटी पर लगे हैं। मानसून में बारिश के दौरान और खरीफ फसलों की बुवाई को देखते हुए भी पंचायत चुनाव कराना मुश्किल होगा। ऐसे में अक्टूबर-नवंबर के आसपास चुनाव की संभावना है, लेकिन अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए उससे चार महीने पहले पंचायत चुनाव कराना सरकार के लिए राजनीतिक जोखिम भरा हो सकता है। ऐसे में माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव के बाद ही पंचायत चुनाव कराया जा सकता है।
पंचायतों में अभी कौन चलाएगा काम?
प्रदेश में ग्राम प्रधानों, क्षेत्र पंचायत सदस्यों और जिला पंचायत सदस्यों का कार्यकाल मई के पहले सप्ताह में समाप्त हो चुका है। ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्षों का पांच साल का कार्यकाल जुलाई के पहले सप्ताह में पूरा होगा। यदि समय पर चुनाव नहीं कराए गए तो इन पदों पर सरकार की ओर से किसी सक्षम अधिकारी को प्रशासक नियुक्त किया जाएगा। पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने संकेत दिया है कि सरकार राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड की तर्ज पर मौजूदा पदेन पदाधिकारियों जिला पंचायत अध्यक्ष, ब्लॉक प्रमुख और ग्राम प्रधान — को ही प्रशासक बनाकर उनका कार्यकाल बढ़ाने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री के सामने रखेगी।
कैबिनेट में और क्या हुआ?
आयोग के गठन के प्रस्ताव के साथ कैबिनेट में जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र नियमावली 2026, पशु चिकित्सा छात्रों का इंटर्नशिप भत्ता बढ़ाने, लखनऊ के शहीद पथ स्थित लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में 1010 बेड के मल्टी स्पेशिएलिटी इमरजेंसी सेंटर के निर्माण और प्रयागराज के स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय परिसर के विस्तार के लिए भूमि हस्तांतरण के प्रस्ताव भी पेश किए गए।
राजनीतिक हलचल तेज
समर्पित ओबीसी आयोग के गठन की कैबिनेट मंजूरी के बाद प्रदेश की सियासत में हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दल सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि यह कदम जानबूझकर चुनाव टालने की रणनीति का हिस्सा है। यदि आरक्षण निर्धारण में थोड़ी भी चूक हुई तो मामला दोबारा अदालत की दहलीज पर पहुंच सकता है। विपक्ष और कई संगठन इस पूरी प्रक्रिया पर पैनी नजर बनाए हुए हैं, जिससे कानूनी अड़चन आने का खतरा हमेशा बना रहता है। योगी सरकार का यह फ़ैसला पंचायत चुनाव की कानूनी ज़रूरत को पूरा करने की दिशा में एक अहम कदम है, लेकिन इससे चुनाव का रास्ता छोटा नहीं हुआ बल्कि सर्वे, रिपोर्ट और आरक्षण सूची की लंबी प्रक्रिया के चलते लाखों मतदाताओं को अभी और इंतजार करना होगा।
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