चीनी जीवविज्ञानी होंगमेई वांग के नेतृत्व में चल रहे एक क्रांतिकारी शोध ने महिलाओं की प्रजनन अवधि को बढ़ाने की संभावना पर नई बहस छेड़ दी है। उनका अध्ययन सुझाव देता है कि मासिक धर्म को हर तीन महीने में एक बार होने के लिए नियंत्रित करने से स्वस्थ अंडाणुओं को संरक्षित किया जा सकता है, जिससे मेनोपॉज में देरी हो सकती है। यह खोज नई प्रजनन तकनीकों का द्वार खोल सकती है, लेकिन एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी से स्वास्थ्य जोखिमों की आशंका भी जता रही है।
शोध का आधार और वैज्ञानिक तर्क
होंगमेई वांग, जो स्टेम सेल एंड रिप्रोडक्टिव बायोलॉजी के स्टेट की लेबोरेटरी में कार्यरत हैं, का मानना है कि सामान्य मासिक चक्र (हर 28-32 दिनों में) से हर माह एक अंडाणु निकल जाता है, जिससे अंडाशय का भंडार समय से पहले समाप्त हो जाता है। यदि ओवुलेशन को धीमा किया जाए, तो अधिक स्वस्थ अंडे लंबे समय तक सुरक्षित रह सकते हैं। चूहों पर प्रारंभिक प्रयोगों में यह संभव दिखा है, जहां स्टेम सेल तकनीक से माहवारी चक्र को नियंत्रित किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, यह शोध चीन की जनसंख्या संकट से प्रेरित है, जहां उम्रदराज आबादी बढ़ रही है। वांग की टीम मानव भ्रूणों और स्टेम कोशिकाओं पर परीक्षण कर रही है, जो भविष्य में IVF जैसी प्रक्रियाओं को बदल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित माहवारी प्रजनन क्षमता का संकेत है, लेकिन अनियमित चक्र (जैसे PCOD में) गर्भधारण में बाधा डालते हैं।
संभावित लाभ और चुनौतियां
लाभ: प्रजनन वर्षों को 40-50 की बजाय 60 तक बढ़ाना संभव हो सकता है, खासकर करियर-केंद्रित महिलाओं के लिए। कम माहवारी से एंडोमेट्रियोसिस या भारी रक्तस्राव जैसी समस्याएं भी कम हो सकती हैं।
जोखिम: एस्ट्रोजन की कमी से हड्डियों की कमजोरी, हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। लंबे अंतराल पर माहवारी अनियमितता का संकेत हो सकती है, जो थायरॉइड या हार्मोनल असंतुलन दर्शाता है।
डॉक्टरों की सलाह: कोई भी चक्र परिवर्तन दवा या हार्मोन थेरेपी से ही करें, स्वयं न आजमाएं।
भारत में प्रासंगिकता और भविष्य
भारत में जहां 30-40% महिलाओं को अनियमित माहवारी की समस्या है, यह शोध प्रासंगिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानव परीक्षण सफल हुए, तो 5-10 वर्षों में क्लिनिकल ट्रायल शुरू हो सकते हैं। हालांकि, नैतिकता और दीर्घकालिक प्रभावों पर बहस अनिवार्य होगी। चीनी शोधकर्ता वांग का कहना है, “यह महिलाओं को अपनी प्रजनन क्षमता पर अधिक नियंत्रण दे सकता है।” लेकिन स्वास्थ्य जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह खोज विज्ञान और समाज दोनों को नई दिशा देगी।
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