‘Slum City’ or ‘Joy of Life’?: पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड तोड़ मतदान, किसकी होगी सरकार BJP या ममता बनर्जी ?

‘Slum City’ or ‘Joy of Life’?: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बीच गर्मागर्म बहस छिड़ गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में दम दम रैली में दावा किया कि वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सरकारों के शासन में कोलकाता ‘झोपड़पट्टियों का शहर’ (city of slums) बन गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी सरकार स्लम बस्तियों को बढ़ावा देकर ‘घुसपैठियों’ को वोट बैंक के रूप में बसाती है, जबकि देश के अन्य शहर स्लम-मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। टीएमसी ने इस बयान की तीखी आलोचना की। राज्‍यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने शाह को ‘थर्ड-ग्रेड पॉलिटिकल टूरिस्ट’ करार देते हुए कहा, “कोलकाता को झोपड़पट्टियों का शहर कहने की हिम्मत कैसे हुई?”

तथ्य क्या कहते हैं?

रिपोर्ट और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कोलकाता में स्लम आबादी एक वास्तविकता है, लेकिन इसे पूरी तरह ‘झोपड़पट्टियों का शहर’ कहना अतिशयोक्ति हो सकती है। कोलकाता नगर निगम (KMC) की वेबसाइट के अनुसार, शहर की कुल आबादी में लगभग एक-तिहाई (करीब 15 लाख लोग) स्लम (बस्ती) में रहते हैं। 2011 की जनगणना और बाद के अनुमानों में भी यह आंकड़ा 30-33% के आसपास है। शहर में करीब 5,500 पंजीकृत और अपंजीकृत स्लम हैं, जहां रहने वाले ज्यादातर लोग अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं।

तुलनात्मक रूप से देखें तो मुंबई में स्लम आबादी का प्रतिशत कहीं ज्यादा है—कुछ अनुमानों में 40-50% से अधिक, जहां धारावी जैसी दुनिया की सबसे बड़ी स्लम बस्ती स्थित है। दिल्ली और चेन्नई जैसे शहरों में भी स्लम की समस्या मौजूद है, लेकिन कोलकाता की तरह घनी आबादी वाले शहरों में यह पुरानी समस्या है। विशेषज्ञों का कहना है कि कोलकाता में स्लम मुख्य रूप से पुरानी औद्योगिक गिरावट, प्रवासन और अपर्याप्त शहरी नियोजन का नतीजा हैं। वाम शासन (1977-2011) और टीएमसी शासन (2011 से अब तक) दोनों में स्लम सुधार कार्यक्रम चले, लेकिन बड़े पैमाने पर पुनर्वास या स्लम-मुक्त अभियान सीमित रहे। केंद्र सरकार के PMAY-Urban जैसे कार्यक्रमों के तहत कुछ प्रगति हुई है, मगर चुनौतियां बरकरार हैं।

शाह के बयान में ‘घुसपैठियों’ का जिक्र चुनावी मुद्दा बन गया है, खासकर सीमा क्षेत्रों में। हालांकि, स्लम आबादी का बड़ा हिस्सा लंबे समय से बसने वाले स्थानीय मजदूर, प्रवासी और अल्पसंख्यक समुदायों का है। फ्रांसीसी लेखक डोमिनिक लापिएर की किताब ‘सिटी ऑफ जॉय’ में भी कोलकाता की स्लम बस्तियों को गरीबी के साथ-साथ संघर्ष और सकारात्मकता के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया था।

93% के रिकॉर्ड वोटिंग टर्नआउट का मतलब क्या?

इसी चुनावी माहौल में पश्चिम बंगाल के पहले चरण (23 अप्रैल 2026) में 152 सीटों पर रिकॉर्ड 92-93% मतदान दर्ज किया गया—स्वतंत्रता के बाद राज्य का सबसे ऊंचा प्रतिशत। चुनाव आयोग के अनुसार, यह 2011 के 78.29% और 2021 के मुकाबले काफी ज्यादा है। कुछ जिलों जैसे दक्षिण दिनाजपुर, कूचबिहार और मुर्शिदाबाद में 93-95% तक पहुंच गया।

यह उच्च टर्नआउट स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान के बाद आया है, जिसमें राज्य की लगभग 9-12% वोटर लिस्ट (करीब 90 लाख नाम) में संशोधन, हटाने या जांच हुई। इसमें मृत, स्थानांतरित या संदिग्ध वोटरों को हटाया गया, जिससे कुछ क्षेत्रों (खासकर मुर्शिदाबाद, मालदा) में विवाद हुआ। उच्च मतदान कई व्याख्याएं देता है:

विरोध का प्रदर्शन: SIR को लेकर असंतोष, खासकर उन इलाकों में जहां नाम हटाए गए। कुछ विश्लेषक इसे ‘एंटी-SIR वोट’ मान रहे हैं।

मजबूत राजनीतिक जागरूकता: बंगाल में हमेशा से उच्च टर्नआउट रहा है, लेकिन इस बार राजनीतिक हिंसा, शिक्षक भर्ती घोटाला, आरजी कर कांड जैसी घटनाओं ने मतदाताओं को सक्रिय किया।

दोनों पक्षों का दावा: भाजपा इसे विकास और बदलाव की लहर बता रही है, जबकि टीएमसी इसे अपनी लोकप्रियता का प्रमाण मान रही है।चुनाव आयोग ने इसे ‘स्वतंत्रता के बाद का सर्वोच्च टर्नआउट’ करार दिया, मगर कुछ क्षेत्रों में हिंसा की छिटपुट घटनाएं भी दर्ज हुईं।

विश्लेषण

अमित शाह का बयान चुनावी रणनीति का हिस्सा लगता है, जिसमें शहरी विकास, घुसपैठ और वोट बैंक की बात को जोड़ा गया। कोलकाता निश्चित रूप से स्लम चुनौतियों से जूझ रहा है—घनी आबादी, पुरानी बुनियादी ढांचा और मौसमी बाढ़ जैसी समस्याएं यहां आम हैं। लेकिन शहर अभी भी ‘कल्चरल कैपिटल’, ‘सिटी ऑफ जॉय’ और पूर्वी भारत का गेटवे के रूप में अपनी पहचान रखता है। स्लम सुधार, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स और बुनियादी सुविधाओं में सुधार की जरूरत है, न कि सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की।

उच्च वोटिंग टर्नआउट लोकतंत्र की ताकत दिखाता है, लेकिन SIR जैसे अभियानों ने विवाद भी पैदा किया। दूसरे चरण (29 अप्रैल) और बाकी चुनाव में ये मुद्दे और गर्म होंगे। अंत में, कोलकाता की सच्चाई न तो पूरी तरह ‘झोपड़पट्टियों का शहर’ है और न ही बिना किसी समस्या का स्वर्गयह एक जटिल, जीवंत महानगर है, जहां गरीबी और संस्कृति साथ-साथ चलती हैं। विकास की सच्ची तस्वीर 4 मई को वोटों की गिनती के बाद सामने आएगी।

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