लोकसभा में तीन बिलों का पैकेज धराशायी: कल (17 अप्रैल) संसद के विशेष सत्र के दूसरे दिन लोकसभा में महिला आरक्षण को लागू करने से जुड़े तीन ऐतिहासिक बिलों पर मैराथन बहस के बाद मतदान हुआ। सरकार ने इन बिलों को एक पैकेज के रूप में पेश किया था, लेकिन संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका। मत विभाजन में 528 सांसदों ने वोटिंग की, जिसमें 298 ने पक्ष में और 230 ने विपक्ष में वोट डाले। बिल पास करने के लिए 352 वोट चाहिए थे, यानी सरकार 54 वोट से पीछे रह गई।
इसके साथ ही संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से अनुरोध किया कि बाकी दो बिल – परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 – आगे न बढ़ाए जाएं। तीनों बिल 16 अप्रैल को पेश किए गए थे। इनका मकसद 2023 के महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को 2029 के लोकसभा चुनाव से लागू करना था, जिसमें लोकसभा की सीटें बढ़ाकर करीब 850 करने और नए परिसीमन का प्रावधान था। सरकार का तर्क था कि इससे महिलाओं को 33% आरक्षण बिना किसी मौजूदा सांसद को हटाए दिया जा सकेगा।
विपक्ष-सत्ता पक्ष की प्रतिक्रियाएं
विपक्ष (इंडिया गठबंधन) ने इसे लोकतंत्र की बड़ी जीत करार दिया। राहुल गांधी ने कहा, “इंडिया ने इसे रोक दिया। मोदी जी घबराकर चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन हमने महिलाओं की आड़ में यह साजिश नहीं होने दी।” कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे “महिलाओं को ढाल बनाकर लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने की नापाक कोशिश” बताया और कहा कि संयुक्त विपक्ष ने इसे कुचल दिया। प्रियंका गांधी ने इसे “लोकतंत्र की बड़ी जीत” कहा। दक्षिणी राज्यों (खासकर तमिलनाडु) ने परिसीमन को 2011 की जनगणना पर आधारित करने का विरोध किया, क्योंकि इससे उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी घटने का खतरा था।
सत्ता पक्ष (एनडीए) ने इसे महिलाओं के साथ धोखा बताया। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, “विपक्ष को महिलाओं के गुस्से का सामना करना पड़ेगा।” स्मृति ईरानी ने इसे “बेटियों के साथ विश्वासघात” करार दिया और कहा कि गांव-गांव में इसका असर दिखेगा। भाजपा की महिला सांसदों ने संसद के बाहर प्रदर्शन किया और विपक्षी नेताओं के खिलाफ नारेबाजी की।
आम जनता की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया और सड़कों पर प्रतिक्रियाएं बंटी हुई हैं। कई महिलाएं और उनके समर्थक निराश हैं, उन्हें लगता है कि आरक्षण में देरी हुई। कुछ ने कहा, “महिलाओं का हक फिर टल गया।” वहीं विपक्ष के समर्थक इसे “दक्षिणी राज्यों और संघीय ढांचे की रक्षा” बता रहे हैं। नोएडा समेत कुछ जगहों पर भाजपा कार्यकर्ताओं ने विपक्ष के खिलाफ प्रदर्शन किए। कुल मिलाकर जनता में बहस छिड़ी हुई है कि क्या यह महिलाओं का मुद्दा था या परिसीमन का राजनीतिक खेल। सरकार ने अभी आगे की रणनीति पर कुछ नहीं कहा है, लेकिन विशेष सत्र जारी है। महिला आरक्षण का इंतजार अब और लंबा खिंच गया है। यह घटना संसद में विपक्ष की एकजुटता और सत्ता पक्ष की रणनीति की सीमा दोनों को उजागर करती है।

