पहली रौनक, वो सुनहरे दिन 1999 में जब अंसल प्रॉपर्टीज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (API Ltd) ने यह सेमी-सर्कुलर मॉल खोला, तो दिल्ली में एयरकंडीशंड शॉपिंग का यह पहला अनुभव था। यहां दिल्ली का पहला शॉपर्स स्टॉप खुला। मैकडॉनल्ड्स डेटिंग स्पॉट बन गया, प्लैनेट एम पर कैसेट-सीडी की रेलम-पेल, मार्क्स एंड स्पेंसर, पिज्जा हट — सब कुछ था। बीच में एम्फीथिएटर में पलाश सेन और यूनफोरिया जैसे बैंड के कॉन्सर्ट होते, फिल्म प्रमोशन्स (2007 में बिपाशा-जॉन अब्राहम की ‘गोल’)। ग्लास एलिवेटर पर बच्चे घंटों चढ़ते-उतरते। “जब अंसल ने घोषणा की कि हुडको प्लेस के अंदर मॉल आ रहा है, तो लगा दुनिया का केंद्र हमारे दरवाजे पर आ गया।” DU स्टूडेंट्स, साउथ दिल्ली की फैमिलीज — सब यहीं आते। प्रोफेसर सेवा राम (स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर) कहते हैं, “यह खाना और शॉपिंग एक छत के नीचे का पहला क्रेज था।”
आज की सच्चाई — ‘भूतिया शहर’ फरवरी 2026 में मॉल घूमने जाएं तो डर लगता है। पार्किंग खाली, साइनबोर्ड गायब, रोशनी कम। अंदर सन्नाटा, आधे-अधूरे रेनोवेशन, पान के थूक, खाली सीढ़ियां। एक पब केयरटेकर (नाम न छापने की शर्त पर) कहते हैं, “3.5 लाख रुपये मंथली रेंट, लेकिन फुटफॉल इतना कम कि गुजारा भी मुश्किल। लिफ्ट-एस्केलेटर ठीक नहीं, मैनेजमेंट सुनता नहीं। शराब की दुकान के कारण माहौल असुरक्षित लगता है — लोग घूरते हैं, फब्तियां कसते हैं। हमने अलग एंट्री-एग्जिट मांगी, लेकिन कुछ नहीं हुआ।” महिलाएं रात में अकेले आने से डरती हैं। पार्किंग से बाइक चोरी हो चुकी। ऊपरी फ्लोर पर सरकारी बैंक और ऑफिसेस हैं, लेकिन रिटेल लगभग खत्म। कंपनी पर संकट अंसल API Ltd पर वित्तीय गड़बड़ी के आरोप लगा था। फरवरी 2025 में NCLT ने इंसॉल्वेंसी प्रोसीडिंग शुरू कर दी। इंटरिम रेजोल्यूशन प्रोफेशनल नियुक्त। प्रणव अंसल (वीसी-एमडी) ने कमेंट करने से इनकार कर दिया।
देशव्यापी ट्रेंड नाइट फ्रैंक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 74 ‘घोस्ट मॉल्स’ हैं (40% से ज्यादा खाली), दिल्ली-NCR में सबसे ज्यादा। कारण — ओवर-सप्लाई, ई-कॉमर्स, पुराना डिजाइन, खराब मैनेजमेंट। कुछ लोग मजाक में ‘उपहार सिनेमा शाप’ भी कहते हैं (1997 की आग के पास होने के कारण), लेकिन असल वजहें व्यावहारिक हैं।
क्या भविष्य है? कुछ नई दुकानें (टी बूटिक, गेम आर्केड) खुल रही हैं, लेकिन उम्मीद कम। पास के कॉलेज स्टूडेंट्स अब सिर्फ मैकडॉनल्ड्स या पीछे के ग्रीन स्पेस के लिए आते हैं। एक स्टूडेंट आकृति माथुर कहती हैं, “मैंने पुराना मॉल नहीं देखा, बस यही खाली-खाली देखा है।” दिल्ली का पहला मॉल, जो एक दौर में सपनों का प्रतीक था, आज उस दौर की याद दिलाता है जब मॉलिंग नया था। अब सवाल है — क्या कोई इसे नई जान देगा, या यह सिर्फ पुरानी यादों का भूतिया खंडहर बनकर रह जाएगा?

