Tamil Nadu 2026 Assembly Elections: राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का ‘कब्रिस्तान’? 2026 विधानसभा चुनाव में BJP की नई रणनीतियां और चुनौतियां

Tamil Nadu 2026 Assembly Elections: तमिलनाडु को लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का ‘कब्रिस्तान’ कहा जाता रहा है। 1967 में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने के बाद द्रविड़ पार्टियों का वर्चस्व कायम है। अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी इसी राज्य में मजबूत पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन अब तक उसे बड़ी सफलता नहीं मिली। 2024 लोकसभा चुनाव में वोट शेयर 11 प्रतिशत से ऊपर पहुंचा, मगर कोई सीट नहीं जीती। आने वाले 2026 विधानसभा चुनावों को लेकर BJP नई उम्मीदें जगाए हुए है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, 1967 में सी.एन. अन्नादुरई के नेतृत्व में DMK ने कांग्रेस को हराकर सत्ता हासिल की थी। तब से राज्य में द्रविड़ पार्टियां—DMK और AIADMK—बारी-बारी से सत्ता में रही हैं। राष्ट्रीय दल जैसे कांग्रेस और BJP यहां सहयोगी की भूमिका तक सीमित रहे। कांग्रेस DMK के साथ गठबंधन में है, जबकि BJP ने अलग-अलग चुनावों में AIADMK या अन्य दलों से गठबंधन किया, लेकिन निर्णायक सफलता नहीं मिली।

ताजा जानकारी के मुताबिक, 2026 विधानसभा चुनाव (अप्रैल-मई में संभावित) के लिए BJP ने तैयारी तेज कर दी है। पार्टी ने 65 से अधिक सीटों को ‘जीतने योग्य’ चिह्नित किया है। चुनावी घोषणा-पत्र के लिए सूचना पेटियां और ऑनलाइन पोर्टल शुरू किए गए हैं, ताकि जनता की राय ली जा सके। पूर्व राज्य अध्यक्ष के. अन्नामलाई की आक्रामक शैली के बाद अब पार्टी गठबंधन पर ज्यादा जोर दे रही है। अन्नामलाई को राष्ट्रीय भूमिका मिलने की चर्चा है, जिससे AIADMK से गठबंधन आसान हो सकता है।

मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने NDA-AIADMK गठबंधन को ‘ब्लैकमेल अलायंस’ करार दिया है और चुनाव को ‘NDA बनाम तमिलनाडु’ की लड़ाई बताया है। दूसरी ओर, अभिनेता विजय की नई पार्टी तमिलगा वेट्रि कड़गम (TVK) ने राजनीति को त्रिकोणीय बनाया है, जिससे विपक्ष बिखरा हुआ दिख रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दक्षिण भारत पर विशेष फोकस कर रहे हैं और तमिलनाडु में कई दौरों की रूपरेखा खिची जा रही है।

BJP नेताओं का दावा है कि वोट शेयर में लगातार बढ़ोतरी (2019 से 2024 तक दोगुना से अधिक) और संगठनात्मक मजबूती से 2026 में ब्रेकथ्रू मिल सकता है। हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि द्रविड़ पहचान, भाषाई मुद्दे और मजबूत स्थानीय नेतृत्व के कारण राष्ट्रीय दलों के लिए राज्य अब भी चुनौतीपूर्ण है।

आने वाले महीनों में गठबंधनों का अंतिम स्वरूप और प्रचार की तीव्रता तय करेगी कि तमिलनाडु पुरानी कहावत पर कायम रहता है या नया अध्याय लिखा जाएगा। फिलहाल राजनीतिक सरगर्मी चरम पर है और सभी दल जनता के बीच पहुंचने में जुटे हैं।

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