नई दिल्ली/नोएडाः देश की सर्वोच्च अदालत ने उत्तर प्रदेश के औद्योगिक केंद्र नोएडा में हुई हिंसक झड़पों के मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि देश के रीढ़ माने जाने वाले श्रमिकों और मजदूरों को जांच के नाम पर प्रताड़ित (Torture) नहीं किया जा सकता। हालांकि नोएडा पुलिस की कार्रवाई को सही मानते हुए हस्त़ोप करने से इंकार कर दिया। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने नोएडा हिंसा मामले से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किए। हालांकि, शीर्ष अदालत ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के उत्तर प्रदेश पुलिस के अधिकार को सही ठहराया और साफ किया कि वह पुलिस की कानूनी कार्रवाई में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी।क्या है पूरा मामला? दरअसल पुलिस ने अब तक हिंसा मामले में कई बड़े कदम उठाए और फडिंग पर भी सवाल उठाते हुए पर्दाफाश किया। पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह इस पूरे मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, नोएडा में हुई हालिया हिंसा और तोड़फोड़ के बाद यूपी पुलिस ने बड़े पैमाने पर उपद्रवियों के खिलाफ धरपकड़ शुरू की थी। इसी कार्रवाई के दौरान पुलिस ने आदित्य आनंद और रूपेश रॉय नामक दो व्यक्तियों को हिरासत में लिया था।
हिरासत में लिए गए आदित्य आनंद के भाई, शव आनंद ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि पुलिस हिरासत (Police Custody) में उनके भाई आदित्य और रूपेश रॉय को बेरहमी से प्रताड़ित किया जा रहा है। याचिका में पुलिस की इस कार्रवाई को मानवाधिकारों का हनन बताते हुए अदालत से तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने क्या कहा?
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कानून और मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाने की बात कही। कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां इस प्रकार रहीं:
- कानून के तहत काम करे पुलिस: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “उत्तर प्रदेश पुलिस कानून के दायरे में रहकर अपना काम कर रही है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए की जा रही इस जांच व कार्रवाई में अदालत कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी।”
- श्रमिकों का सम्मान जरूरी: पुलिस को हरी झंडी देने के साथ ही पीठ ने सख्त लहजे में कहा, “लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में श्रमिकों को प्रताड़ित नहीं किया जा सकता। पुलिस यह सुनिश्चित करे कि किसी भी मजदूर या आरोपी के साथ हिरासत में दुर्व्यवहार न हो।”
कोर्ट का संदेश: न्यायपीठ ने स्पष्ट किया कि अपराध की जांच करना पुलिस का कर्तव्य है, लेकिन कानून किसी भी नागरिक या मजदूर को हिरासत में शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की इजाजत नहीं देता।
नोएडा पुलिस की दलील
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से पक्ष रखते हुए कहा गया कि नोएडा हिंसा एक गंभीर कानून-व्यवस्था का संकट था, जिसमें सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। पुलिस केवल मुख्य साजिशकर्ताओं और हिंसा में शामिल लोगों की पहचान कर रही है और पूरी कार्रवाई कानून के स्थापित नियमों (Due Process of Law) के तहत ही की जा रही है। किसी भी बेगुनाह या मजदूर को बेवजह परेशान नहीं किया जा रहा है।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद अब नोएडा पुलिस पर जांच को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए रखने का दोहरा दबाव होगा। अदालत के इस आदेश से जहां एक तरफ पुलिस को उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखने की छूट मिल गई है, वहीं दूसरी तरफ हिरासत में बंद आरोपियों की सुरक्षा और उनके मानवाधिकारों को लेकर पुलिस को अब बेहद सतर्क रहना होगा। स्थानीय मजदूर संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के इस मानवीय दृष्टिकोण का स्वागत किया है।
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