Road accidents News: भारत में सड़क दुर्घटनाएं एक गंभीर समस्या बनी हुई हैं। साल 2023 में ही 1.7 लाख से अधिक लोगों की जान सड़क हादसों में गई। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के फलोदी (14 मरे) और तेलंगाना की NH 163 (19 मरे) में हुए दो बड़े हादसों का संज्ञान लिया। विशेषज्ञों के अनुसार, खराब लाइसेंसिंग, कमजोर कानून प्रवर्तन, घटिया इंफ्रास्ट्रक्चर और अपर्याप्त ट्रॉमा केयर जैसी समस्याएं इस संकट की जड़ हैं।
लाइसेंसिंग में क्या खामियां हैं?
ड्राइविंग लाइसेंस सड़क सुरक्षा की पहली कड़ी होना चाहिए, लेकिन भारत में यह महज औपचारिकता बनकर रह गया है। कई जगहों पर बिना किसी औपचारिक ट्रेनिंग के लाइसेंस जारी हो जाते हैं। टेस्ट छोटे ट्रैक पर कुछ चक्कर लगाने तक सीमित रहते हैं। कमर्शियल ड्राइवरों—जो 15 टन से भारी वाहन चलाते हैं और दर्जनों यात्री ढोते हैं—के लिए कोई मानकीकृत सुरक्षा प्रशिक्षण नहीं है। लाइसेंस मिलने के बाद ड्राइवर की स्किल, शारीरिक फिटनेस या मानसिक सतर्कता की कोई नियमित जांच नहीं होती। थके-मांदे, कमजोर नजर वाले या बीमार ड्राइवर बेरोकटोक भारी वाहन चलाते हैं, जिससे हादसे बढ़ते हैं।
कानून प्रवर्तन की कमजोरी
स्पीडिंग, ओवरलोडिंग, लेन उल्लंघन और शराब पीकर गाड़ी चलाना घातक हादसों के प्रमुख कारण हैं। लेकिन इन पर नियंत्रण के लिए मैनुअल पुलिसिंग पर निर्भरता है, जो संसाधनों की कमी और मानवीय त्रुटि से ग्रस्त है। ऑटोमेटेड कैमरे और डिजिटल चालान जैसी तकनीक मौजूद है, लेकिन कवरेज सीमित है, डेटा एकीकरण कमजोर और जुर्माने की वसूली प्रभावी नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन और तकनीकी निरोध की वकालत की है, पर राज्यों में इसे अपनाना असमान है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की खामियां
भारत की सड़कें ‘अक्षम्य’ बन चुकी हैं—छोटी गलती भी जानलेवा साबित हो सकती है। पुरानी डिजाइन वाली हाईवे गति के लिए बने थे, सुरक्षा के लिए नहीं। खराब कर्व, क्रैश बैरियर की कमी, अपर्याप्त लाइटिंग और रेस्ट एरिया न होना भारी वाहनों को हाईवे पर पार्किंग के लिए मजबूर करता है। मेंटेनेंस में लापरवाही—टूटे डिवाइडर, खुले कंक्रीट स्ट्रक्चर, अनमार्क्ड निर्माण जोन और अतिक्रमण—आम हैं। शहरों में पैदल यात्रियों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर नगण्य है, जिससे वे भारी वाहनों से स्पेस के लिए संघर्ष करते हैं।
हालांकि, पायलट प्रोजेक्ट्स उम्मीद जगाते हैं। मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर ‘जीरो फैटैलिटी कॉरिडोर’ प्रोग्राम के तहत डिजाइन सुधार और प्रवर्तन से मौतें आधी से अधिक कम हुईं।
ट्रॉमा केयर में सुधार की जरूरत
सड़क हादसों में कई मौतें प्रभाव से नहीं, बल्कि उसके बाद के ‘गोल्डन ऑवर’ में उपचार की कमी से होती हैं। एम्बुलेंस नेटवर्क असमान है—ग्रामीण इलाकों में देरी एक घंटे से अधिक, शहरों में भी बायस्टैंडर्स या पुलिस बिना उपकरण के पीड़ितों को निकालते हैं। हादसे वाली जगह के निकट अस्पतालों में ट्रॉमा स्पेशलिस्ट, ब्लड बैंक या रिससिटेशन सुविधाएं अक्सर नहीं होतीं। प्रस्तावित ‘राइट टू ट्रॉमा केयर’ कानून समयबद्ध आपात प्रतिक्रिया और समन्वित नेटवर्क अनिवार्य कर सकता है।
एकीकृत दृष्टिकोण की कमी
लाइसेंसिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रवर्तन और ट्रॉमा केयर अलग-अलग विभागों के साइलो में काम करते हैं। सुरक्षा तभी संभव जब ये एक साथ काम करें, जवाबदेही और समन्वय के साथ।
सेवलाइफ फाउंडेशन के संस्थापक पीयूष तिवारी का कहना है कि ये सुधार लागू होने तक भारत की सड़कें मौत का तांडव जारी रखेंगी।
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