पश्चिम बंगाल एक पहेली: पश्चिम बंगाल एक अजीब विरोधाभास का शिकार है, राज्य में स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबी उन्मूलन जैसे सामाजिक सूचकांकों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय और रोजगार के मामले में राज्य राष्ट्रीय औसत से पीछे बना हुआ है।
सामाजिक क्षेत्र में उपलब्धियाँ
NITI आयोग की 2023 की बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में गरीबी दर 11.89% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 14.96% है। यह 2022-23 में और घटकर 8.60% (अनुमानित) होने की उम्मीद है, जो राष्ट्रीय औसत 11.28% से कम है। राज्य में महिला साक्षरता और उच्च शिक्षा में भी सुधार देखा गया है, शहरी क्षेत्रों में उच्च शिक्षा की आकांक्षा बढ़ी है। हालाँकि, ज्यादातर महिलाएं अभी भी कम उत्पादकता वाले, अनौपचारिक और घर-आधारित कार्यों, जैसे कृषि, तंबाकू उत्पादन और पारंपरिक शिल्प, में संलग्न हैं।
आर्थिक विकास, लेकिन आय में खाई बरकरार
2022-23 में पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय ₹1,41,373 (करीब $1,700) थी, जिसके 2025-26 में ₹2,03,095 ($2,400) तक पहुँचने का अनुमान है। लेकिन यह राष्ट्रीय औसत और अन्य विकसित राज्यों की तुलना में काफी कम बना हुआ है। 2025-26 के राज्य बजट के अनुसार पश्चिम बंगाल की GSDP ₹20.3 लाख करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है, जो राष्ट्रीय औसत से 12% की वृद्धि दर्शाती है।
निवेश और रोजगार की चुनौती
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में कहा कि बंगाल में पूंजी निर्माण 2010 में 6.7% से गिरकर हाल के वर्षों में 2.9% पर आ गया है — जो निवेश के प्रति राज्य सरकार की नीतियों का नतीजा है। पिछले पाँच वर्षों में 2,200 से अधिक कंपनियों ने पश्चिम बंगाल से अपना पंजीकृत कार्यालय दूसरे राज्यों में स्थानांतरित कर दिया है, जिनमें 39 सूचीबद्ध कंपनियाँ भी शामिल हैं।
सरकार का ‘बंगाल मॉडल’
2025-26 के बजट में सामाजिक क्षेत्र को प्राथमिकता दी गई, कुल ₹3.01 लाख करोड़ के राजस्व व्यय में से ₹1.6 लाख करोड़ सामाजिक क्षेत्र के लिए निर्धारित किए गए हैं। राज्य सरकार ‘कन्याश्री’, ‘कृषक बंधु’, ‘युवश्री’ और ‘बांग्लार बाड़ी’ जैसी कल्याणकारी योजनाओं को अपने विकास मॉडल की धुरी मानती है।
कर्ज का बोझ
2025-26 में राज्य पर अनुमानित बकाया कर्ज ₹7,71,670 करोड़ तक पहुँचने की आशंका है, और कर्ज की अदायगी के लिए ₹81,000 करोड़ खर्च करने होंगे।
निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल की यही पहेली है, गरीबी हटाने और सामाजिक योजनाओं में सफलता के बावजूद, औद्योगिक निवेश और रोजगार सृजन में पिछड़ापन आय वृद्धि को बाधित कर रहा है। 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले यह सवाल और प्रासंगिक हो गया है कि क्या कल्याण योजनाएं दीर्घकालिक आर्थिक समृद्धि की जगह ले सकती हैं।

