Double kill : नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी इजरायल-अमेरिका-ईरान तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट ने भारतीय तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) पर दोहरा दबाव बना दिया है।
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फरवरी 2026 में भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत 69.01 डॉलर प्रति बैरल थी, जो मार्च में बढ़कर 117.09 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। इसी तरह वैश्विक ब्रेंट क्रूड करीब 112 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर है, जो बीते महीने के मुकाबले लगभग 60 प्रतिशत अधिक है।
इस बीच रुपये की कमजोरी भी कंपनियों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। 28 फरवरी को जहां रुपया 91.07 प्रति डॉलर था, वहीं 21 मार्च को यह गिरकर 93.49 के स्तर पर पहुंच गया। तेल कंपनियों के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में हर एक डॉलर की बढ़ोतरी से करीब 16,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
हालांकि मौजूदा परिस्थितियों में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना कम नजर आ रही है, लेकिन कंपनियों ने प्रीमियम पेट्रोल में 2 रुपये प्रति लीटर और थोक डीजल में 22 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर संकेत दे दिए हैं कि लागत का दबाव लगातार बढ़ रहा है। फरवरी से मार्च के बीच महंगे कच्चे तेल और कमजोर रुपये का सीधा असर कंपनियों के मार्जिन पर पड़ना तय है।
उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि अगस्त 2025 से फरवरी 2026 के दौरान कच्चे तेल की कीमत 62 से 69 डॉलर प्रति बैरल के बीच रही, जिससे कंपनियों को पेट्रोल पर 5 से 10 रुपये और डीजल पर 8 से 15 रुपये प्रति लीटर का मार्जिन मिला। लेकिन अब लागत बढ़ने के कारण स्थिति बदल गई है।
वर्तमान में पेट्रोल पर करीब 20 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 40 रुपये प्रति लीटर तक अंडर-रिकवरी होने का अनुमान है। गौरतलब है कि फरवरी 2022 के बाद से इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम ने खुदरा कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की है।
राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 94.77 रुपये और डीजल 87.67 रुपये प्रति लीटर पर स्थिर है। हालांकि युद्ध जोखिम प्रीमियम, माल ढुलाई और बीमा लागत में बढ़ोतरी से कंपनियों का खर्च लगातार बढ़ रहा है। खुदरा कीमतें स्थिर रहने से उपभोक्ताओं को राहत जरूर मिल रही है, लेकिन कंपनियों को घाटा उठाना पड़ रहा है।
ब्रोकरेज कंपनियों ने भी इस स्थिति को लेकर चिंता जताई है। एम्बिट और यूबीएस की रिपोर्ट के अनुसार, यदि ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है तो वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही में एचपीसीएल घाटे में जा सकती है, जबकि इंडियन ऑयल और बीपीसीएल के मुनाफे में 50 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंडर-रिकवरी का यह दबाव लंबे समय तक बना रहता है तो कंपनियों के कैश फ्लो पर असर पड़ेगा, कर्ज बढ़ सकता है और सरकार को सब्सिडी या उत्पाद शुल्क में कटौती जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं। हालांकि सरकार ने फिलहाल स्पष्ट किया है कि आम उपभोक्ताओं पर कीमत बढ़ोतरी का बोझ नहीं डाला जाएगा।
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