ट्रंप ने ईरान को सर्वनाश करने की धमकी दी, ग्रीनलैंड सुरक्षा समझौता, शी से ताइवान हथियार बिक्री

न्यूयॉर्क/वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) को संबोधित करते हुए ईरान को लेकर कड़ी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि अगर शांति समझौता नहीं हुआ तो वह इस्लामिक रिपब्लिक को ‘नष्ट’ (annihilate) कर सकते हैं, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि नवंबर के मिडटर्म चुनाव के तुरंत बाद डील हो जाएगी। इसी दौरान ट्रंप ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं के साथ आर्कटिक सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए, जबकि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से इस हफ्ते वाशिंगटन में होने वाली मुलाकात में ताइवान को हथियार बिक्री रोकने का दबाव बनने की आशंका जताई गई है।

ट्रंप ने महासभा में कहा, “मेरे सामने बड़ा फैसला है। क्या ईरान के साथ ऐसी डील होगी जिससे वह पहले से बेहतर देश बन सके, या मैं इस्लामिक रिपब्लिक को जल्दी नष्ट कर दूं ताकि वह फिर कभी लोगों और देशों को मारने-नष्ट करने का मौका न पाए? क्या मैं उन्हें नरक में धकेल दूं जहां न बचने का कोई मौका हो और न भविष्य की कोई उम्मीद?” उन्होंने जोड़ा कि ईरान मिडटर्म चुनाव (3 नवंबर) के नतीजे देख रहा है, लेकिन चुनाव उनके फैसले को प्रभावित नहीं करेगा। “ईरान के मामले में चुनाव मेरे दिमाग में भी नहीं आता। एकमात्र बात यह है कि ईरान के पास कभी परमाणु हथियार नहीं होंगे।” ट्रंप ने अन्य देशों से ईरान का आर्थिक अलगाव करने की अपील की ताकि वह आतंकवाद समर्थन, शिपिंग पर हमले और परमाणु महत्वाकांक्षा छोड़ दे।

ट्रंप के भाषण के दौरान ईरानी प्रतिनिधिमंडल के कई सदस्य हॉल से बाहर चले गए। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ईरान के साथ बातचीत जारी है और समझौते की संभावना बनी हुई है।

ग्रीनलैंड समझौता: आर्कटिक में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति बढ़ेगी

ट्रंप के भाषण के बाद यूएन मुख्यालय में डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नील्सन के साथ त्रिपक्षीय समझौते पर दस्तखत हुए। यह समझौता ग्रीनलैंड (डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र) पर अमेरिकी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने की अनुमति देता है। ट्रंप ने कहा कि इससे अमेरिका को “सुरक्षा और अन्य जरूरतों पर स्थायी नियंत्रण” मिलता है। कोई भी अमेरिकी विरोधी देश ग्रीनलैंड में सैन्य उपस्थिति या संवेदनशील निवेश अमेरिकी लिखित अनुमति के बिना नहीं कर सकेगा।

समझौते के तहत “गोल्डन डोम” बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली स्थापित की जा सकेगी। मौजूदा पिटुफिक स्पेस बेस के अलावा नार्सार्सुआक (पुराना कोल्ड वॉर एयरबेस) और मेस्टर्सविग में दो नए सैन्य स्थल खोले जाएंगे। ट्रंप ने कहा, “हम तुरंत बड़े सैन्य उपस्थिति का विकास शुरू करेंगे। दो बहुत बड़े सैन्य बेस बनाए जाएंगे।”

फ्रेडरिकसेन ने इसे “हमेशा के लिए” चलने वाला समझौता बताया जो नाटो की भूमिका मजबूत करता है और ग्रीनलैंड के आत्मनिर्णय के अधिकार का सम्मान करता है। नील्सन ने आर्कटिक में नाटो की मजबूती पर जोर दिया। यह सौदा ट्रंप की पहले की पूर्ण अधिग्रहण मांग से कम है, लेकिन कोल्ड वॉर के बाद अमेरिकी सैन्य बुनियादी ढांचे का सबसे बड़ा विस्तार माना जा रहा है। 1951 के रक्षा संधि में संशोधन किया गया है।

शी-ट्रंप मुलाकात: ताइवान हथियार बिक्री पर दबाव

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग बुधवार को वाशिंगटन पहुंच रहे हैं। गुरुवार को औपचारिक वार्ता और शुक्रवार को नेशनल आर्काइव्स का दौरा प्रस्तावित है। सूत्रों के अनुसार, शी 1982 के संयुक्त वक्तव्य (तीसरा जॉइंट कम्युनिक) का हवाला देते हुए ट्रंप से ताइवान को हथियार बिक्री रोकने का दबाव डाल सकते हैं। चीन इसे ताइवान मुद्दे को शांतिपूर्ण समाधान के लिए जरूरी शर्त मानता है।

अमेरिका कानूनन ताइवान को आत्मरक्षा के साधन उपलब्ध कराने के लिए बाध्य है। ट्रंप प्रशासन ने दिसंबर में 11 अरब डॉलर का सबसे बड़ा पैकेज मंजूर किया था, लेकिन करीब 14 अरब डॉलर का दूसरा पैकेज महीनों से रुका हुआ है। ट्रंप ने इसे “अच्छा सौदेबाजी का कार्ड” बताया था। व्हाइट हाउस ने कहा कि ट्रंप जल्द फैसला लेंगे। अमेरिका “सिक्स एश्योरेंसेज” के तहत हथियार बिक्री बंद करने की तारीख तय नहीं करता और चीन से पहले सलाह नहीं लेता। ताइवान और अमेरिकी रिपब्लिकन सांसद इस मुद्दे पर दृढ़ रुख बनाए रखने की अपील कर रहे हैं।

यूएन महासभा में लगभग 130 विश्व नेता जुटे हैं। यूक्रेन, मध्य पूर्व संघर्ष, एआई जोखिम और यूएन की प्रासंगिकता प्रमुख मुद्दे हैं। ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की सहित कई नेताओं से मुलाकात की। शी इस सत्र में भाग नहीं ले रहे, बल्कि ट्रंप से द्विपक्षीय वार्ता को प्राथमिकता दे रहे हैं।

ये घटनाक्रम ट्रंप की दूसरी अवधि में अमेरिका की आक्रामक कूटनीति, आर्कटिक सुरक्षा, मध्य पूर्व और इंडो-पैसिफिक में प्रतिस्पर्धा को रेखांकित करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान डील, ग्रीनलैंड समझौते का क्रियान्वयन और ताइवान मुद्दे पर आगे की वार्ता वैश्विक स्थिरता पर गहरा असर डाल सकती है।

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