The slap that ruined the life of a 14-year-old student: गांधीनगर कोर्ट ने शिक्षिका को सुनाई 3 साल 3 महीने की सजा

The slap that ruined the life of a 14-year-old student: एक पल के गुस्से ने एक 14 साल की नाबालिग छात्रा की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी और उसकी शिक्षिका को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। गांधीनगर की थर्ड एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट कोर्ट ने निजी स्कूल की साइंस टीचर परुलबेन को होमवर्क नहीं करने पर छात्रा को थप्पड़ मारने के मामले में 3 साल 3 महीने की कैद और 50,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है।

यह दिल दहला देने वाली घटना 2020 की है। कोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार, गांधीनगर के सेक्टर-28 स्थित एक निजी स्कूल में परुलबेन ने कक्षा 9 की छात्रा को सबक सिखाने के इरादे से उसके बाएं गाल पर जोरदार थप्पड़ मारा था। इस थप्पड़ से छात्रा का बायां कान का पर्दा (ईयरड्रम) फट गया, जिसके कारण उसकी सुनने की क्षमता स्थायी रूप से प्रभावित हो गई। डॉक्टरों ने मेडिकल रिपोर्ट में इसकी पुष्टि की।

पीड़िता के माता-पिता ने गुस्से और दुख से भरे होकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। ज्यादातर मामलों में कॉर्पोरल पनिशमेंट की शिकायतें स्कूलों में ही दबा दी जाती हैं, लेकिन इस मामले में चोट की गंभीरता ने परिवार को कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर किया। पांच साल तक चले मुकदमे में मेडिकल रिपोर्ट, गवाहों के बयान और स्कूल के सबूतों के आधार पर कोर्ट ने शिक्षिका को दोषी ठहराया।

कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की संबंधित धाराओं के तहत 3 साल 3 महीने की साधारण कैद और 25,000 रुपये जुर्माना, तथा जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 75 (नाबालिग के साथ क्रूरता) के तहत 1 साल की साधारण कैद और 25,000 रुपये जुर्माना सुनाया। कुल जुर्माना 50,000 रुपये है।

फैसले में जज ने कड़े शब्दों में कहा, “शिक्षक द्वारा अपनी अधिकार का दुरुपयोग कर एक मासूम बच्चे पर शारीरिक हिंसा बहुत गंभीर अपराध है। ऐसे कृत्यों को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और समाज में कड़ा संदेश देने की जरूरत है।”

यह फैसला गुजरात के शिक्षा जगत में बड़ा संदेश दे रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में राइट टू एजुकेशन (RTE) एक्ट 2009 और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के बावजूद स्कूलों में शारीरिक दंड के मामले सामने आते रहते हैं, लेकिन यह सजा ऐसे मामलों में न्याय की उम्मीद जगाती है। शिक्षा अधिकारियों ने सभी स्कूलों को चेतावनी दी है कि क्लासरूम को डर का नहीं, सुरक्षा का स्थान बनाना होगा।

पीड़िता की जिंदगी पर पड़ा यह स्थायी असर और शिक्षिका की सजा इस बात की याद दिलाता है कि गुस्से का एक पल कितनी बड़ी त्रासदी ला सकता है।

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