प्लास्टिक नोट की दस्तक: क्या बदल जाएगा आपकी जेब का कागज?

आरबीआई गवर्नर ने दिए संकेत, पायलट प्रोजेक्ट की तैयारी, लेकिन ‘नोटबंदी’ जैसा कोई झटका नहीं

भारत की मुद्रा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव दस्तक दे रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) एक बार फिर प्लास्टिक यानी पॉलीमर नोट लाने की योजना को गंभीरता से आगे बढ़ा रहा है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 5 जून को मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वीकार किया कि पॉलीमर नोट का प्रस्ताव अभी प्रारंभिक चरण में है। यदि लागू किया गया तो कागज के नोटों की जगह धीरे-धीरे पॉलीमर आधारित मुद्रा ले सकती है। यह खबर सोशल मीडिया पर आग की तरह फैली और इसके साथ-साथ कुछ भ्रामक अफवाहें भी उड़ने लगीं जैसे कि नए प्लास्टिक नोट से गांधी जी की तस्वीर हटा दी जाएगी और ₹500 का नोट बंद हो जाएगा। सरकार को आगे आकर स्पष्ट करना पड़ा कि ₹500 का मौजूदा नोट पूरी तरह वैध है और उसे बंद नहीं किया जा रहा।

दो बोर्ड बैठकों में उठा मुद्दा, पायलट प्रोजेक्ट की उम्मीद

सूत्रों के अनुसार, पॉलीमर नोट का मुद्दा आरबीआई के पटना और मुंबई में हुए पिछले दो केंद्रीय बोर्ड बैठकों में प्रमुखता से उठाया गया। उत्पादन लागत में संभावित फायदे और नोटों की अधिक आयु को देखते हुए यह निर्णय लेने पर विचार किया जा रहा है। केंद्रीय बैंक बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले प्लास्टिक नोटों की व्यावहारिकता परखने के लिए एक पायलट परियोजना शुरू करने पर विचार कर रहा है।

सालाना हजारों करोड़ की लागत, खरबों नोट होते हैं बर्बाद

पॉलीमर नोट की चर्चा के पीछे सबसे बड़ी वजह है, बेतहाशा बढ़ती नोट छपाई की लागत और करोड़ों नोटों की बर्बादी।आरबीआई ने वित्त वर्ष 2024-25 में नोट छापने पर ₹6,373 करोड़ खर्च किए, जो वित्त वर्ष 2025-26 में घटकर लगभग ₹4,875 करोड़ रह गए, यानी करीब 23.5 प्रतिशत की कमी। हालांकि पिछले पांच वर्षों में यह खर्च लगातार उतार-चढ़ाव भरा रहा है। वित्त वर्ष 2024-25 में 23.8 अरब खराब नोट चलन से बाहर कर नष्ट किए गए, जो पिछले साल की तुलना में 12.3 प्रतिशत अधिक था। इनमें सबसे अधिक ₹500 के नोट थे FY26 में लगभग 598.3 करोड़ नोट चलन से बाहर हुए, जबकि ₹100 के करीब 581.1 करोड़ नोट बाहर किए गए। 

पॉलीमर नोट क्या है और यह बेहतर कैसे है?

पॉलीमर नोट कपास आधारित कागज की जगह एक विशेष पॉलीप्रोपाइलीन प्लास्टिक सब्सट्रेट से बनाए जाते हैं। इनमें पारदर्शी खिड़कियां, होलोग्राफिक तत्व और कई सुरक्षा परतें शामिल होती हैं। इनकी उत्पादन लागत शुरुआत में कागज के नोट से 2 से 3 गुना अधिक हो सकती है, लेकिन इनकी आयु कागजी नोट से 4 से 5 गुना अधिक होती है।भारत में कागजी नोट जल्दी खराब हो जाते हैं क्योंकि बार-बार उपयोग और विभिन्न जलवायु परिस्थितियां उन्हें नुकसान पहुंचाती हैं। ऐसे में लंबे समय में पॉलीमर नोट ज्यादा किफायती साबित हो सकते हैं।

यह ‘नोटबंदी’ नहीं है — समझिए फर्क

आरबीआई ने अभी तक प्लास्टिक नोट लाने का कोई अंतिम निर्णय नहीं किया है। गवर्नर संजय मल्होत्रा के अनुसार यह प्रस्ताव अभी विचाराधीन है और केंद्रीय बैंक सावधानी से आगे बढ़ रहा है क्योंकि इसमें कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियां, उत्पादन लागत और परिचालन पहलुओं पर विचार करना जरूरी है। यह 2016 की नोटबंदी जैसा अचानक झटका नहीं होगा। यदि लागू हुआ तो यह भारत की मुद्रा प्रणाली में नोटबंदी के बाद महात्मा गांधी न्यू सीरीज की शुरुआत के बाद का सबसे बड़ा बदलाव होगा। 

नकद अर्थव्यवस्था की नब्ज — 42.86 लाख करोड़ रुपये चलन में

यह बदलाव इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि भारत आज भी नकद पर बहुत अधिक निर्भर है। भारत में मुद्रा की मांग रिकॉर्ड 42.86 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। दिहाड़ी मजदूर, किसान, छोटे दुकानदार और ग्रामीण इन सभी की आजीविका आज भी नकद नोट पर टिकी है। इस वर्ग के लिए हर बड़ा बदलाव सीधे रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालता है।

गांधी जी की तस्वीर और अफवाहों का सच

सोशल मीडिया पर वायरल हुई उन तस्वीरों का कोई आधार नहीं है जिनमें नए प्लास्टिक नोट से गांधी जी की तस्वीर हटाकर उनकी जगह केवल अशोक स्तंभ दिखाया गया। अभी तक न आरबीआई ने, न सरकार ने ऐसा कोई प्रस्ताव सार्वजनिक किया है। नीति अभी अपने प्रारंभिक चरण में है और कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। 

निष्कर्ष: तकनीक जरूरी, पर जनता की प्राथमिकता भी जरूरी

पॉलीमर नोट की अवधारणा नई नहीं है। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन और कई अन्य देश दशकों से इसका सफलतापूर्वक उपयोग कर रहे हैं। भारत के लिए भी यह दीर्घकाल में फायदेमंद हो सकता है — लेकिन इसका कार्यान्वयन सुनियोजित, पारदर्शी और चरणबद्ध होना चाहिए। असली सवाल यह नहीं है कि नोट कागज का होगा या प्लास्टिक का असली सवाल यह है कि उस नोट की कीमत बनाए रखी जाए, ताकि एक मजदूर की दिनभर की मेहनत और एक किसान का पसीना व्यर्थ न जाए।

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