शिल्पा शिरोडकर: बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शिरोडकर ने हाल ही में एक इंटरव्यू में खुलकर बताया कि वे काम की तलाश में बिल्कुल संकोच नहीं करतीं। उन्होंने कहा, “अगर मेरे पास किसी का नंबर है या मैं किसी से मिलूं तो मैं सबको बोलती हूं कि भाई मुझे काम चाहिए, तो कुछ अच्छा होगा तो दे दो।” यह सीधा और ईमानदार तरीका उन्होंने अपनाया है, जो फिल्म इंडस्ट्री में अक्सर एक बड़ा प्रोफेशनल टैबू माना जाता है—खुलकर काम मांगना।
शिल्पा ने इंस्टेंट बॉलीवुड को दिए इंटरव्यू में बताया कि हाल ही में उनकी तेलुगु फिल्म जटाधारा नवंबर में रिलीज हुई थी, जो बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा सफल नहीं रही। लेकिन इसके बावजूद वे व्यस्त हैं। वे एक वेब सीरीज कर रही हैं, साथ ही एक और फिल्म पर काम चल रहा है, जिसकी आधिकारिक घोषणा जल्द होने वाली है। शिल्पा ने कहा, “टचवुड, भगवान की कृपा से साल के अंत तक मैं बिजी हूं।”
टैबू तोड़ने का फायदा
शिल्पा की यह अप्रोच कई लोगों के लिए प्रेरणादायक है। वे मानती हैं कि अगर आपको काम चाहिए और कोई मदद कर सकता है, तो उसे बताने में कोई हर्ज नहीं। “There is no harm. अगर काम चाहिए और कोई दिलवा सकता है, तो वो व्यक्ति कम से कम जान तो ले।”
ऑर्गनाइजेशनल साइकोलॉजिस्ट गुरलीन बरुआह (That Culture Thing) ने शिल्पा के इस तरीके को ‘एक अच्छा अप्रोच’ बताया। उन्होंने कहा, “यह डायरेक्ट, ईमानदार और क्लियर है। बहुत से लोग डर के मारे पीछे हट जाते हैं, लेकिन पूछना आपके कंट्रोल में है। इससे दरवाजे खुलते हैं, क्योंकि लोग मदद करना चाहते हैं, लेकिन तब तक नहीं जानते जब तक आप न बताएं। यह क्लैरिटी, इनिशिएटिव और अपने गोल्स के प्रति सीरियसनेस दिखाता है।”
‘गिवर’ नेटवर्किंग का महत्व
गुरलीन बरुआह ने आगे बताया कि नेटवर्किंग को सिर्फ ‘लेना’ नहीं, बल्कि ‘देना’ भी होना चाहिए। एडम ग्रांट की किताब Give and Take का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि बॉउंड्रीज के साथ गिवर सबसे बेहतर परफॉर्म करते हैं। मदद करो, लेकिन खुद का फायदा होने दो—ट्रस्ट और रिकॉल बनता है, जिससे आपकी बात उन कमरों में भी होती है जहां आप खुद नहीं होते।
उन्होंने सलाह दी:
असली बातचीत पर फोकस करो, सिर्फ आउटकम पर नहीं। फॉलो-अप करो, लेकिन ओवर मत करो। खुद से ईमानदार और कॉन्फिडेंट रहो—यह क्वाइट कॉन्फिडेंस सबसे ज्यादा काम करता है।
शिल्पा शिरोडकर की यह वापसी काफी चर्चा में है। बिग बॉस में भी नजर आने के बाद अब वे ओटीटी और फिल्मों में एक्टिव हैं। उनकी यह खुली बातचीत दिखाती है कि टैलेंट के साथ-साथ प्रोएक्टिव माइंडसेट और सही नेटवर्किंग कितना जरूरी है। कई मीडिया रिपोर्ट्स में भी इस खबर को कवर किया गया है, जो साबित करता है कि शिल्पा की यह सोच आज के वर्कप्लेस में रिलेटेबल और उपयोगी है।
निष्कर्ष: शिल्पा शिरोडकर का संदेश साफ है—डरो मत, पूछो। क्योंकि पूछने में कोई शर्म नहीं, बस थोड़ी हिम्मत चाहिए। और एक्सपर्ट भी यही मानते हैं कि यह तरीका न सिर्फ काम दिलाता है, बल्कि लंबे समय के रिश्ते भी बनाता है।
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