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नौ साल की उम्र से शुरू हुआ संगीत का सफर
- उस्ताद अली अकबर खान के मार्गदर्शन में निखरी कला; पद्मश्री से हुए सम्मानित
Pandit Rajiv Taranath : नई दिल्ली। भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में पंडित राजीव तारानाथ का नाम सरोद की मधुर धुनों, रागों की गहरी समझ और साधना के लिए विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपनी कला से भारतीय संगीत परंपरा को समृद्ध किया और देश-विदेश में अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से श्रोताओं के दिलों में जगह बनाई। उनका जीवन संगीत के प्रति समर्पण, निरंतर अभ्यास और अपनी रुचि को जीवन का उद्देश्य बनाने की प्रेरक मिसाल है।
पंडित राजीव तारानाथ का जन्म 7 अक्टूबर 1932 को बेंगलुरु में एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित तारानाथ ने उन्हें संगीत की शुरुआती शिक्षा दी। बचपन से ही संगीत के प्रति उनकी गहरी रुचि थी। महज नौ वर्ष की उम्र में उन्होंने सार्वजनिक रूप से गायन प्रस्तुति दी। आगे चलकर उन्होंने सरोद को अपनी साधना का प्रमुख माध्यम बनाया और भारतीय शास्त्रीय संगीत में अलग पहचान स्थापित की। Pandit Rajiv Taranath :
राजीव तारानाथ उस्ताद अली अकबर खान के प्रमुख शिष्यों में शामिल थे। उन्हें पंडित रविशंकर और विदुषी अन्नपूर्णा देवी से भी संगीत का मार्गदर्शन मिला। उस्ताद अली अकबर खान के सान्निध्य में उनके सरोद वादन को नई दिशा मिली। उनकी प्रस्तुतियों में रागों की बारीकियों, सुरों की गहराई और वाद्ययंत्र पर असाधारण पकड़ का प्रभाव दिखाई देता था।
संगीत के साथ उनका शैक्षणिक जीवन भी उल्लेखनीय रहा। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में पीएचडी की और तिरुचिरापल्ली के क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य किया। लेकिन संगीत के प्रति उनका समर्पण इतना गहरा था कि उन्होंने अध्यापन का करियर छोड़कर पूरी तरह संगीत को अपना लिया। इसके बाद वे कलकत्ता गए और उस्ताद अली अकबर खान के मार्गदर्शन में संगीत साधना जारी रखी। Pandit Rajiv Taranath :
उनकी कला भारत तक सीमित नहीं रही। उन्होंने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में प्रस्तुतियां देकर भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2019 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य सम्मान भी प्राप्त हुए।
11 जून 2024 को मैसूर, कर्नाटक में 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। हालांकि, उनके सरोद की धुनें और संगीत के प्रति उनका समर्पण भारतीय शास्त्रीय संगीत की विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं। पंडित राजीव तारानाथ का जीवन बताता है कि सच्ची साधना और कला के प्रति निष्ठा किसी कलाकार को समय और सीमाओं से परे पहचान दिलाती है। Pandit Rajiv Taranath

