बेंच ने सुनवाई से पहले हरीश के माता-पिता से कोर्ट के चैंबर में मुलाकात की और उनकी बात सुनी। कोर्ट ने कहा, “ये मुद्दे बहुत नाजुक हैं। हम भी इंसान हैं। कौन तय करे कि कौन जिए और कौन मरे? हम उपचार हटाने पर विचार करेंगे।” एमिकस क्यूरी (कोर्ट का सहायक वकील) और केंद्र सरकार की ओर से पेश एएसजी ऐश्वर्या भाटी की दलीलों के बाद फैसला सुरक्षित रखा गया।
हरीश राणा का मामला क्या है?
हरीश राणा 2013 में चंडीगढ़ में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद गंभीर रूप से घायल हो गए थे। तब से वे कोमा में हैं और पूरी तरह बिस्तर पर हैं। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार उनकी स्थिति अपरिवर्तनीय है—ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं। वे फीडिंग ट्यूब और अन्य सहायता पर निर्भर हैं। उनके माता-पिता ने इलाज के लिए नौकरी छोड़ दी और घर तक बेच दिया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ।
माता-पिता की याचिका में कहा गया कि लगातार उपचार जारी रखना हरीश के गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने 2024 में याचिका खारिज कर दी थी, क्योंकि हरीश बिना बाहरी सहायता के जीवित रह सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी नवंबर 2024 में याचिका खारिज की थी, लेकिन अब दोबारा विचार हो रहा है।
पैसिव यूथेनेशिया का कानूनी आधार
भारत में 2018 के अरुणा शानबाग मामले के फैसले से पैसिव यूथेनेशिया वैध है, जिसमें जीवन रक्षक उपचार हटाया जा सकता है। 2023 में गाइडलाइंस भी बनाई गईं। अगर कोर्ट अनुमति देता है, तो यह भारत में पहला स्वीकृत पैसिव यूथेनेशिया मामला हो सकता है।
फैसला आने का इंतजार है। यह मामला जीवन, मृत्यु और गरिमा के अधिकार पर बड़ी बहस छेड़ रहा है।

