Noida News: हाईकोर्ट ने अकृति चौधरी की NSA हिरासत को रद्द कर 5 लाख रुपये मुआवजे का आदेश दिया, जबकि अक्षत त्रिपाठी को जारी 5 लाख रुपये के बॉन्ड नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए। कमिश्नरेट व्यवस्था में शांति भंग की आशंका पर कार्रवाई की शक्ति जिलाधिकारी के बजाय पुलिस कमिश्नरेट के अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेटों के पास होती है। लेकिन इन शक्तियों के इस्तेमाल पर कानून और न्यायालय दोनों की सीमाएं भी तय करते हैं।
अकृति चौधरी मामले ने खड़े किए बड़े सवाल
गौतमबुद्ध नगर में अप्रैल 2026 में हुए श्रमिक आंदोलन के बाद छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता अकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत निरुद्ध किया गया था। राज्य की ओर से आरोप लगाया गया कि आंदोलन के दौरान हिंसा भड़काने में उनकी भूमिका थी। पुलिस ने उनके खिलाफ इलेक्ट्रॉनिक और वीडियो साक्ष्य होने का दावा भी किया था।
मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत ने रिकॉर्ड की विस्तृत जांच के बाद NSA के तहत निरुद्ध करने के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत के अनुसार उपलब्ध सामग्री में अकृति चौधरी को हिंसा भड़काने से जोड़ने वाला पर्याप्त विश्वसनीय साक्ष्य नहीं था। अदालत ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण विरोध और सार्वजनिक स्थान पर अपनी बात रखने का अधिकार संविधान के तहत संरक्षित है।
हाईकोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम के आदेश और संबंधित पुलिस अधिकारियों द्वारा तैयार किए गए रिकॉर्ड पर भी कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने अकृति चौधरी को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया और राशि की वसूली जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से करने को कहा। संबंधित अधिकारियों के सेवा अभिलेख में अदालत की नाराजगी दर्ज करने का भी निर्देश दिया गया।
अदालत की टिप्पणी का मूल संदेश यह था कि NSA जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल सामान्य कानून के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी चेताया कि शांतिपूर्ण आंदोलन को केवल संभावित कानून-व्यवस्था की आशंका के आधार पर दबाना लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए गंभीर खतरा हो सकता है।
अब सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी
इस फैसले के बाद 9 सितंबर 2026 को केंद्र के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देगी। यानी अकृति चौधरी प्रकरण पर कानूनी लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है।
दूसरा मामला: अक्षत त्रिपाठी को 5 लाख के बॉन्ड का नोटिस
इसी बीच गौतमबुद्ध नगर में एक अलग मामला सामने आया। गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी को प्रदर्शन से जुड़े मामले में BNSS की धारा 126/135 के क्रम में धारा 130 का नोटिस जारी किया गया। इसमें शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये के निजी बॉन्ड और दो जमानतदारों की बात सामने आई।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने इस तरह के नोटिस पर गंभीर सवाल उठाए। इसके बाद पुलिस ने स्पष्ट किया कि नोटिस 4 सितंबर को जारी हुआ था और 5 सितंबर को उसे निरस्त कर दिया गया। पुलिस ने यह भी कहा कि नोटिस जारी करने में हुई लापरवाही को लेकर संबंधित कर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई थी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुलिस और जिला प्रशासन दोनों की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि यह नोटिस जिलाधिकारी मेधा रूपम के कार्यालय से जारी नहीं हुआ था। गौतमबुद्ध नगर में कमिश्नरेट व्यवस्था लागू होने के कारण कार्यपालक मजिस्ट्रेट की ये शक्तियां पुलिस कमिश्नरेट के अधिकृत अधिकारियों के पास हैं।
कमिश्नरेट में आखिर शांति भंग का मुचलका कौन लगा सकता है?
यहां पुराने CrPC और वर्तमान BNSS को समझना जरूरी है।
पहले CrPC में शांति बनाए रखने से संबंधित कार्रवाई मुख्य रूप से धारा 107/116 के तहत होती थी। अब नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS में इसका प्रमुख प्रावधान धारा 126 और उससे आगे के अध्याय में है।
BNSS की धारा 126 के अनुसार जब किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को ऐसी सूचना मिलती है कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है या सार्वजनिक शांति को प्रभावित कर सकता है और कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार है, तो मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को कारण बताने के लिए कह सकता है कि उससे शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड क्यों न भरवाया जाए। यह अवधि अधिकतम एक वर्ष तक हो सकती है।
प्रक्रिया सामान्य तौर पर इस तरह आगे बढ़ती है
पहला चरण—पुलिस की रिपोर्ट
पुलिस को किसी व्यक्ति से शांति भंग की आशंका दिखाई देती है तो वह अपनी रिपोर्ट तैयार कर सकती है। रिपोर्ट में आरोप, परिस्थितियां, विवाद का स्वरूप और शांति भंग की आशंका का आधार होना चाहिए।
दूसरा चरण—कार्यपालक मजिस्ट्रेट के सामने मामला
रिपोर्ट के आधार पर अधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेट यह देखता है कि वास्तव में कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार है या नहीं।
तीसरा चरण—धारा 130 का आदेश
यदि मजिस्ट्रेट संतुष्ट है तो व्यक्ति को कारण बताओ नोटिस दिया जाता है। इसमें यह बताया जाना चाहिए कि किस आधार पर उससे शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड मांगा जा रहा है।
चौथा चरण—सुनवाई और जांच
इसके बाद मजिस्ट्रेट को मामले में लगाए गए आरोपों की सच्चाई की जांच करनी होती है। BNSS की धारा 135 इसी जांच की प्रक्रिया से संबंधित है। कानून मजिस्ट्रेट को आवश्यक साक्ष्य लेने की अनुमति देता है।
पांचवां चरण—जरूरत होने पर अंतरिम बॉन्ड
यदि जांच के दौरान मजिस्ट्रेट को लगता है कि तत्काल शांति भंग रोकना जरूरी है तो लिखित कारण दर्ज करके व्यक्ति से अंतरिम बॉन्ड या बेल बॉन्ड लेने का आदेश दिया जा सकता है। कुछ परिस्थितियों में बॉन्ड नहीं देने पर हिरासत भी हो सकती है, लेकिन यह कानून की निर्धारित प्रक्रिया और सीमाओं के अधीन है।
छठा चरण—अंतिम फैसला
जांच पूरी होने के बाद मजिस्ट्रेट यह तय करता है कि व्यक्ति को वास्तव में शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने के लिए पाबंद किया जाए या कार्यवाही समाप्त कर दी जाए।
पुलिस 24 घंटे से ज्यादा अपने स्तर पर नहीं रख सकती
यह एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी अंतर है।
BNSS की धारा 170 पुलिस को किसी संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए बिना वारंट गिरफ्तारी की शक्ति देती है, लेकिन ऐसी गिरफ्तारी के बाद व्यक्ति को सामान्यतः 24 घंटे से अधिक पुलिस हिरासत में नहीं रखा जा सकता, जब तक किसी अन्य कानूनी प्रावधान के तहत आगे की हिरासत अधिकृत न हो।
इसी वजह से हाईकोर्ट ने 2026 में एक अन्य कमिश्नरेट मामले में भी इस बात पर गंभीर आपत्ति जताई कि बॉन्ड निष्पादित होने के बावजूद व्यक्ति को जेल में क्यों रखा गया।
कमिश्नरेट में DM की जगह कौन?
यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
गौतमबुद्ध नगर में 2020 से पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था लागू है। इस व्यवस्था के तहत सरकार ने पुलिस कमिश्नर को कार्यपालक मजिस्ट्रेट तथा अन्य मजिस्ट्रेट संबंधी शक्तियां प्रदान की हैं। पुरानी व्यवस्था में जो कार्य जिलाधिकारी और कार्यपालक मजिस्ट्रेट करते थे, उनमें कानून-व्यवस्था से जुड़े कई अधिकार कमिश्नरेट व्यवस्था में पुलिस अधिकारियों को दिए गए।
व्यवहार में पुलिस आयुक्त तथा शासन द्वारा अधिकृत उनके अधीन अधिकारी/कार्यपालक मजिस्ट्रेट BNSS की शांति-व्यवस्था संबंधी धाराओं में कार्रवाई कर सकते हैं। गौतमबुद्ध नगर पुलिस ने अक्षत मामले में भी यही स्पष्ट किया कि संबंधित नोटिस कमिश्नरेट के मजिस्ट्रेट कार्यालय से जारी हुआ था, जिलाधिकारी कार्यालय से नहीं।
इसलिए यह कहना कि “कमिश्नरेट क्षेत्र में हर शांति भंग के मुचलके पर DM की मंजूरी जरूरी है” सही नहीं होगा।
लेकिन क्या कमिश्नरेट अधिकारियों को मनमानी की छूट है?
बिल्कुल नहीं।
कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्ति मिलने का मतलब यह नहीं है कि किसी भी व्यक्ति को केवल पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर मनमाने ढंग से भारी रकम का बॉन्ड भरने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 के एक फैसले में स्पष्ट किया कि शांति बनाए रखने के लिए मांगी जाने वाली जमानत/बॉन्ड राशि परिस्थितियों के अनुरूप होनी चाहिए। अत्यधिक राशि निर्धारित नहीं की जा सकती। उसी मामले में कोर्ट ने BNSS की धारा 126 और 135 की प्रक्रिया को विस्तार से देखा।
यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल में 5 लाख रुपये के बॉन्ड वाला नोटिस सामने आने के बाद इसी सवाल ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी कि शांति भंग की आशंका में इतनी बड़ी रकम किस आधार पर तय की गई थी। सुप्रीम कोर्ट में भी इसी वजह से सवाल उठा।
NSA और शांति भंग का मुचलका एक चीज नहीं
यह अंतर आपकी खबर में जरूर स्पष्ट होना चाहिए।
शांति भंग का बॉन्ड एक निरोधात्मक कार्रवाई है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को भविष्य में शांति भंग करने से रोकना है। इसमें BNSS की धारा 126 आदि की प्रक्रिया लागू होती है।
जबकि NSA यानी राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम अलग और कहीं अधिक कठोर कानून है। इसके तहत व्यक्ति को सामान्य आपराधिक मुकदमे के अलावा निवारक हिरासत में रखा जा सकता है। अकृति चौधरी का मामला इसी NSA कार्रवाई से संबंधित था।
इसलिए अकृति चौधरी के NSA आदेश को अक्षत त्रिपाठी के BNSS बॉन्ड नोटिस के साथ सीधे जोड़ना कानूनी रूप से सही नहीं होगा। दोनों मामलों में समानता सिर्फ इतनी है कि दोनों में कानून-व्यवस्था और निवारक कार्रवाई की शक्तियों के इस्तेमाल पर सवाल उठे हैं।
सबसे बड़ा सवाल: शक्ति है तो जवाबदेही किसकी?
गौतमबुद्ध नगर के हालिया विवाद ने तीन स्तरों पर सवाल खड़े किए हैं।
पहला, पुलिस की रिपोर्ट कितनी ठोस थी?
दूसरा, कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने पुलिस रिपोर्ट का स्वतंत्र रूप से परीक्षण किया या केवल रिपोर्ट के आधार पर आदेश जारी किया?
तीसरा, बॉन्ड की रकम परिस्थितियों के अनुरूप थी या अत्यधिक?
अकृति चौधरी मामले में हाईकोर्ट ने खास तौर पर कहा कि जिलाधिकारी को रिकॉर्ड की बारीकी से जांच करनी चाहिए थी और केवल पुलिस के आरोपों पर कठोर NSA कार्रवाई नहीं करनी चाहिए थी। अक्षत त्रिपाठी मामले में नोटिस बाद में निरस्त कर दिया गया और पुलिस ने संबंधित कर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की बात कही। यानी कमिश्नरेट में मजिस्ट्रेट की शक्ति पुलिस के पास आने से न्यायिक और संवैधानिक नियंत्रण समाप्त नहीं हो जाता। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ऐसी कार्रवाई की समीक्षा कर सकते हैं।
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