जीना मुश्किल हो जाएगा: हनीट्रैप और ब्लैकमेल गिरोह पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, मेरठ जोन आईजी को जांच के आदेश

जीना मुश्किल हो जाएगा: उत्तर प्रदेश के मेरठ जोन में हनीट्रैप और ब्लैकमेल की बढ़ती घटनाओं को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मेरठ जोन में संचालित कथित हनीट्रैप और ब्लैकमेल गिरोह की जांच के आदेश दिए हैं तथा मेरठ जोन के पुलिस महानिरीक्षक (IG) को इस पूरे मामले की जांच का निर्देश दिया।

क्या था पूरा मामला?

अदालत एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक महिला और चार अन्य आरोपियों ने अपने खिलाफ दर्ज मामले को रद्द (quash) करने की मांग की थी। आरोपों के अनुसार, पहली याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता को संपर्क कर बिजनौर के एक होटल में बुलाया, जहां उनके बीच शारीरिक संबंध बनाए गए। इस दौरान छिपकर वीडियो बना लिया गया, जिसके बाद आरोपियों ने कथित तौर पर शिकायतकर्ता से ₹10 लाख की मांग करते हुए ब्लैकमेल करना शुरू किया। मामला और गंभीर इसलिए है क्योंकि शिकायतकर्ता को एक स्थान पर बुलाया गया, जहां दो पुलिसकर्मी जो इस मामले में आरोपी भी हैं मुख्य आरोपी के साथ मिले हुए थे और उन्होंने वीडियो दिखाकर पैसों की मांग की।  हालांकि पीड़ित ने हिम्मत दिखाते हुए पैसे देने से इनकार किया और पुलिस को सूचित किया।

हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

जस्टिस जे जे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कहा कि इस तरह के गिरोह का अस्तित्व, जो महिलाओं के जरिए लोगों को फंसाकर ब्लैकमेल करता है, समाज की “गंभीर रूप से चिंताजनक स्थिति” को दर्शाता है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि इस तरह के अपराधों को जारी रहने दिया गया, तो एक सभ्य समाज में जीवन यापन करना मुश्किल हो जाएगा।

क्या निर्देश दिए गए?

मामले को “अत्यंत गंभीर” बताते हुए हाईकोर्ट ने मेरठ जोन के सभी जिला पुलिस प्रमुखों को सतर्क रहने और कड़ी निगरानी रखने के निर्देश दिए। साथ ही, कोर्ट ने रजिस्ट्रार (कम्प्लायंस) को आदेश की प्रति डीजीपी, मेरठ जोन के आईजी और उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को भेजने का निर्देश दिया। अंत में, याचिका को वापस लेने के आधार पर खारिज कर दिया गया।

विशेष चिंता: पुलिसकर्मियों की संलिप्तता

इस मामले में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि आरोपियों में खुद पुलिसकर्मी भी शामिल हैं, जो कानून के रखवाले होते हुए भी ऐसे गिरोह का हिस्सा बने। हाईकोर्ट का स्वतः संज्ञान लेना इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से ले रही है।

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