1968 की यात्रा: गर्मजोशी और साझा मूल्यों की मिसाल
10 अक्टूबर 1968 को दोपहर 12:45 बजे इंदिरा गांधी का विमान वेनेजुएला के सिमोन बोलिवार अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर उतरा। यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली वेनेजुएला यात्रा थी। राष्ट्रपति राउल लियोनी ने उन्हें कैबिनेट मंत्रियों के साथ स्वागत किया। सैन्य बैंड ने दोनों देशों के राष्ट्रगान बजाए।
हवाईअड्डे पर हजारों स्थानीय लोग और भारतीय समुदाय जमा थे। इंदिरा गांधी हरी साड़ी में बेहद खुश नजर आईं। उन्होंने प्रोटोकॉल तोड़कर बच्चों और लोगों से फूल कबूल किए। काराकास पहुंचकर उन्होंने सिमोन बोलिवार के मकबरे पर पुष्पांजलि भी अर्पित की थी।
अपने भाषण में इंदिरा ने कहा – “मैं लातीन अमेरिका और अपने देश के बीच प्रेम के पुल बनाने आई हूं।” राष्ट्रपति लियोनी ने दोनों देशों की गरीबी और आत्मनिर्णय की लड़ाई को साझा बताया। यात्रा के अंत में दोनों नेताओं ने संयुक्त बयान जारी कर व्यापार, संस्कृति और विज्ञान में सहयोग की घोषणा की।
भारत लौटकर इंदिरा गांधी ने लोकसभा में कहा – “दक्षिण अमेरिका हमें से ज्यादा हमें जानता है। महात्मा गांधी, टैगोर और नेहरू के नाम वहां व्यापक रूप से जाने जाते हैं।” यह यात्रा भारत की गैर-संरेखित नीति और विकासशील देशों से रिश्तों की मिसाल थी।
आज का संकट: अमेरिकी कार्रवाई के बाद भारत की चिंता
2026 की शुरुआत में वेनेजुएला में भारी उथल-पुथल मची है। अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद देश में अस्थिरता बढ़ गई है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को कहा – “वेनेजुएला में हाल के घटनाक्रम गहरी चिंता का विषय हैं। हम स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। भारत वेनेजुएला के लोगों की सुरक्षा और कल्याण का समर्थन करता है। सभी पक्षों से शांतिपूर्ण संवाद की अपील करता हूं।”
विदेश मंत्रालय ने प्रेस रिलीज में कहा – “हम सभी संबंधित पक्षों से मुद्दों को शांतिपूर्वक सुलझाने का आग्रह करते हैं।” भारत ने अपने नागरिकों को गैर-जरूरी यात्रा से बचने की सलाह दी है।
द्विपक्षीय संबंधों की वर्तमान स्थिति
भारत और वेनेजुएला ने 2024 में राजनयिक संबंधों के 65 वर्ष पूरे किए। दोनों देशों में स्थायी दूतावास हैं। हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण तेल आयात कम हुआ है – 2023-24 में 1.4 अरब डॉलर से घटकर 2024-25 में सिर्फ 25 करोड़ डॉलर रह गया। फिर भी भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी है और संकट में संतुलित रुख अपनाया है।
1968 की वह छोटी यात्रा आज भी दोनों देशों के साझा इतिहास की याद दिलाती है, जब उपनिवेशवाद-विरोध और विकास की आकांक्षाएं जोड़ती थीं। आज के संकट में भारत शांति और स्थिरता की उम्मीद करता है। 


