उत्तर डकोटा के सीनेटर केविन क्रेमर और मोंटाना के स्टीव डेन्स ने 16 जनवरी 2026 को ट्रंप को लिखी चिट्ठी में कहा कि भारत का यह टैरिफ अमेरिकी दाल उत्पादकों को बड़ा नुकसान पहुंचा रहा है। दोनों राज्य अमेरिका में दालों के प्रमुख उत्पादक हैं। चिट्ठी में लिखा है, “भारत ने 30 अक्टूबर 2025 को येलो पीज पर 30% टैरिफ की घोषणा की, जो 1 नवंबर से लागू हो गया। इससे अमेरिकी उत्पादक भारत के बाजार में प्रतिस्पर्धा में पीछे रह गए।”
भारत का ‘चुपके’ जवाब?
ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल कई भारतीय उत्पादों पर 50% तक टैरिफ लगाए थे, जिसके बाद व्यापार वार्ताएं ठंडी पड़ गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि दालों पर टैरिफ भारत का सूक्ष्म जवाब था। सोशल मीडिया पर भी इसे “साइलेंट रिटेलिएशन” कहा जा रहा है। एक यूजर ने लिखा, “हमने चुपचाप जवाब दिया।” हालांकि भारतीय सरकार ने इसे आधिकारिक रूप से रिटेलिएशन नहीं बताया। सूत्रों के मुताबिक, यह कदम घरेलू किसानों की सुरक्षा और खाद्य महंगाई नियंत्रण के लिए था।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उपभोक्ता है (वैश्विक खपत का 27%) और मुख्य रूप से चना, मसूर, अरहर और पीली मटर खाता है। पहले भारत ने महंगाई रोकने के लिए कुछ दालों पर आयात शुल्क घटाया था, लेकिन अमेरिकी दबाव के बाद इसे फिर बढ़ाया गया।
व्यापार समझौते पर असर
सीनेटर्स ने ट्रंप से कहा कि किसी भी व्यापार समझौते में अमेरिकी दालों को बेहतर बाजार पहुंच दिलाई जाए। उन्होंने 2020 में भी इसी मुद्दे पर चिट्ठी लिखी थी, जिसे ट्रंप ने मोदी को सौंपी थी। तब “नमस्ते ट्रंप” इवेंट के दौरान दोनों नेताओं की दोस्ती दिखी थी, लेकिन व्यापार समझौता नहीं हुआ।
भारत के लिए कृषि और डेयरी बाजार “रेड लाइन” हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समझौते में घरेलू किसानों को नुकसान पहुंचाने वाली शर्तें आईं तो डील नहीं होगी। फिलहाल दोनों देशों के बीच मिनी ट्रेड डील की बात चल रही है, लेकिन दालों का मुद्दा नया अड़ंगा बन सकता है।
भारतीय वाणिज्य मंत्रालय ने अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

