India-US relations: रूसी तेल पर छूट और व्यापार सौदे में ‘अमेरिका फर्स्ट’, एक ही सिक्के के दो पहलू

India-US relations: भारत और अमेरिका के बीच इन दिनों एक साथ दो बड़े घटनाक्रम सामने आए हैं। एक तरफ अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने की अस्थायी छूट दी है, तो दूसरी तरफ अमेरिकी अधिकारी ने साफ कह दिया है कि व्यापार सौदे में ‘अमेरिका पहले’ की नीति से कोई समझौता नहीं होगा। दोनों घटनाएं एक ही बड़ी तस्वीर का हिस्सा हैं। मध्य पूर्व में जारी ईरान युद्ध की पृष्ठभूमि में भारत-अमेरिका की रणनीतिक और आर्थिक नजदीकी।

🛢️ रूसी तेल पर 30 दिन की छूट, क्यों और कैसे?
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने गुरुवार को एलान किया कि वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बनाए रखने के लिए ट्रेजरी विभाग भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने की 30 दिन की अस्थायी छूट दे रहा है।

अमेरिकी ट्रेजरी के OFAC (Office of Foreign Assets Control) ने ‘General License 133’ जारी किया, जो 5 मार्च 2026 से पहले लदे रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री, डिलीवरी या उतराई की अनुमति देता है। यह छूट 4 अप्रैल 2026 तक लागू रहेगी। शर्त यह है कि माल भारतीय बंदरगाहों पर उतारा जाए और खरीदार भारतीय कानून के तहत पंजीकृत कंपनी हो। इस फैसले का असर तेल बाजार पर तुरंत दिखाई दिया, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड में 8.51% की भारी उछाल आई और वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट भी 4.93% चढ़ा।

भारत के लिए इसकी जरूरत क्यों?
भारत के पास अभी केवल करीब 25 दिनों की मांग के बराबर कच्चे तेल का भंडार है। देश के कुल तेल आयात का लगभग 40 फीसदी हिस्सा मध्य पूर्व से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है और ईरान के साथ संघर्ष ने इस रास्ते को बंद कर दिया है। रिपोर्टों के मुताबिक इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और मैंगलोर रिफाइनरी जैसी सरकारी कंपनियां पहले से ही ट्रेडर्स के जरिए रूसी क्रूड खरीदने की बातचीत कर रही हैं। सूत्रों के मुताबिक करीब 2 करोड़ बैरल तेल की खरीद हो चुकी है।

अमेरिका का तर्क क्या है?
बेसेंट ने कहा कि यह एक सीमित और अल्पकालिक उपाय है जिससे रूस को कोई खास आर्थिक फायदा नहीं होगा, क्योंकि इसमें केवल वही तेल शामिल है जो पहले से समुद्र में फंसा हुआ है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका चाहता है कि भारत आने वाले वर्षों में अमेरिकी ऊर्जा की खरीद बढ़ाए।

व्यापार सौदा: ‘अमेरिका फर्स्ट’ — चीन वाली गलती नहीं दोहराएंगे
इसी बीच नई दिल्ली में रायसीना डायलॉग में अमेरिका के उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लांडाउ ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर बेबाक बयान दिया। लांडाउ ने कहा, “भारत को समझना होगा कि हम भारत के साथ वही गलती नहीं दोहराएंगे जो हमने 20 साल पहले चीन के साथ की थी — जब हमने उन्हें बाजार विकसित करने दिया और फिर देखा कि वे हमें कई व्यावसायिक क्षेत्रों में पछाड़ रहे हैं। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि जो भी करें, वह हमारे लोगों के लिए उचित हो।”

उन्होंने यह भी कहा कि ‘अमेरिका फर्स्ट’ का मतलब ‘अमेरिका अकेला’ नहीं है। व्यापार सौदे के बारे में लांडाउ ने उत्साह जताते हुए कहा कि यह डील “लगभग अंतिम चरण में” है। लांडाउ ने यह भी जोड़ा कि अमेरिका और भारत मिलकर आतंकवाद-रोधी, समुद्री सुरक्षा, रक्षा सहयोग और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में साझेदारी गहरी कर सकते हैं।

🔗 दोनों खबरों का आपसी रिश्ता — बड़ी तस्वीर क्या है?
ये दोनों घटनाएं एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं। अमेरिका एक साथ दो काम कर रहा है:
पहला — ईरान युद्ध के कारण वैश्विक तेल संकट को काबू में रखने के लिए भारत को रूसी तेल की अस्थायी छूट दे रहा है, ताकि बाजार स्थिर रहे।
दूसरा — साथ ही भारत पर दबाव भी बनाए रख रहा है कि वह लंबे समय में अमेरिकी तेल और व्यापार की तरफ मुड़े, और यह सुनिश्चित कर रहा है कि भारत को वे आर्थिक रियायतें न मिलें जो चीन को मिली थीं।लांडाउ ने साफ कहा कि अमेरिका भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए वैकल्पिक स्रोत के रूप में खुद को पेश कर रहा है — “आपसे बेहतर विकल्प अमेरिका से नहीं हो सकता।” ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2026 में रूस की हिस्सेदारी भारत के कुल तेल आयात में 20 फीसदी से नीचे आ गई — मई 2022 के बाद पहली बार।

संक्षेप में: अमेरिका भारत को एक हाथ से राहत दे रहा है और दूसरे हाथ से शर्तें भी रख रहा है। यह कूटनीति का वह खेल है जिसमें भारत को अपने राष्ट्रीय हित साधते हुए बेहद सावधानी से चलना होगा।

यह भी पढ़ें: New Bollywood box office drama: यश की ‘टॉक्सिक’ ने ‘धुरंधर 2’ से टकराव टाला, लेकिन अब वरुण धवन की ‘है जवानी तो इश्क होना है’ से जून क्लैश; BAFTA विजेता ‘बूंग’ आज रिलीज, मणिपुर की कहानी दिल छू लेगी

यहां से शेयर करें