मीडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में एक युवा बेघर महिला ने अपना दर्द बयां किया – “सोते हुए लोग चिपट जाते हैं, अगर दुत्कारो तो मारपीट करते हैं। कभी घर-परिवार वाली थी मैं, लेकिन वक्त ने सब छीन लिया।” उसकी तरह हजारों महिलाएं दिल्ली की सड़कों पर रात गुजारती हैं। कई घरेलू हिंसा से भागकर आई हैं, तो कई नौकरी छूटने या परिवार की उपेक्षा के कारण बेघर हो गईं।
एक हालिया सर्वे के अनुसार, 2024 के मध्य तक दिल्ली में 3 लाख से ज्यादा लोग बेघर थे, जिनमें महिलाओं की संख्या काफी है। 7 अक्टूबर 2025 में जारी एक अध्ययन में पाया गया कि दिल्ली की बेघर महिलाओं में से 86% को मासिक धर्म स्वच्छता की सुविधाएं नहीं मिलतीं, जबकि कई घरेलू हिंसा का शिकार होकर सड़कों पर आईं। 22 लगभग 45% महिलाएं भीख मांगकर या घरेलू काम करके गुजारा करती हैं, जबकि 20% से ज्यादा घरेलू हिंसा से भागी हुई हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह कि 98% बेघर महिलाओं को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी तक नहीं है। 10 शहरी बेघरों के लिए आश्रय (एसयूएच) योजना के तहत दिल्ली में कई नाइट शेल्टर हैं, लेकिन इनमें सुविधाओं की कमी, असुरक्षा और भीड़ के कारण कई महिलाएं इनमे नहीं आती हैं।
एनजीओ सेंटर फॉर होलिस्टिक डेवलपमेंट के निदेशक सुनील कुमार अलेदिया कहते हैं, “नीतियां अच्छी हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। लिंग-संवेदी आश्रयों की कमी और जागरूकता न होना बड़ी समस्या है।”
राष्ट्रीय स्तर पर 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में करीब 17.73 लाख बेघर थे, जिनमें शहरी क्षेत्रों में 9.38 लाख। विशेषज्ञों का मानना है कि अब यह संख्या काफी बढ़ चुकी है। 11 14 बेघर महिलाएं यौन शोषण, हिंसा और स्वास्थ्य समस्याओं की सबसे ज्यादा शिकार होती हैं।
सरकार और एनजीओ मिलकर प्रयास कर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं के लिए अलग और सुरक्षित आश्रय गृह बढ़ाने, जागरूकता अभियान चलाने और पुनर्वास की ठोस नीति की जरूरत है। ठंड की इन रातों में ये महिलाएं सिर्फ छत नहीं, सम्मान और सुरक्षा की भी हकदार हैं।

