हरीश राणा का AIIMS में निधन: 13 साल का मौन संघर्ष समाप्त, भारत के पहले ‘पैसिव यूथेनेशिया’ मामले का दुखद अंत

हरीश राणा का AIIMS में निधन: दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में 13 साल से कोमा में पड़े 32 वर्षीय हरीश राणा ने मंगलवार को अंतिम सांस ली। सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से देश का पहला पैसिव इच्छामृत्यु (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) मामला पूरा हो गया। गाजियाबाद के राजनगर निवासी हरीश को 14 मार्च को AIIMS के पलियेटिव केयर यूनिट में भर्ती कराया गया था। 15 मार्च को उनका भोजन बंद किया गया और 17 मार्च से पानी भी रोक दिया गया। पिछले करीब 10 दिनों से न भोजन न पानी दिए जाने के बावजूद उनकी हालत स्थिर रही, लेकिन आज दोपहर उनके निधन की पुष्टि हो गई।

सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को हरीश के माता-पिता की याचिका पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जिसमें 2013 में चंडीगढ़ के पंजाब यूनिवर्सिटी हॉस्टल से चौथी मंजिल से गिरने के बाद हुए गंभीर ब्रेन इंजरी के कारण स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में पहुंचे हरीश को गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार दिया गया। AIIMS की विशेष मेडिकल टीम ने चरणबद्ध तरीके से लाइफ सपोर्ट (फीडिंग ट्यूब और अन्य सपोर्ट) हटाने की प्रक्रिया अपनाई।

परिवार की प्रतिक्रिया:
हरीश के माता-पिता ने लंबे संघर्ष के बाद यह फैसला लिया। मां निर्मला देवी ने कोर्ट फैसले के बाद कहा था, “बेटे के इलाज के लिए हर संभव प्रयास किए। बड़े-बड़े अस्पतालों में दिखाया और कई डॉक्टरों से इलाज कराया, लेकिन उम्मीदें लगभग खत्म हो गई हैं। अब तो बस भगवान से यही प्रार्थना है कि उसे इस पीड़ा से जल्द मुक्ति मिल जाए।” AIIMS में भर्ती के दौरान वे भावुक होकर कह रही थीं, “मेरा बेटा सांस ले रहा है। उसकी धड़कन अभी भी चल रही है… वह मुझे छोड़कर जा रहा है।” पिता अशोक राणा ने कहा, “मैं बेटे के दर्द को बता नहीं सकता। उसकी पीड़ा और तड़प को देख नहीं सकता था। हमारी साढ़े बारह साल की सेवाओं का हिसाब-किताब अब पूरा हो रहा है।”

परिवार ने AIIMS जाते समय भावुक विदाई दी। एक रिश्तेदार ब्रह्माकुमारी लवली ने हरीश से कहा, “सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए अब जाओ…” परिवार ने निधन के बाद हरीश के कार्यशील अंगों (किडनी, लीवर, हृदय, फेफड़े, अग्न्याशय, आंत आदि) को दान करने की इच्छा जताई है। AIIMS के सूत्रों के अनुसार, अंगों की जांच चल रही है।

डॉक्टरों की प्रतिक्रिया:
AIIMS की पलियेटिव केयर यूनिट की प्रमुख डॉ. सीमा मिश्रा ने बताया, “सामान्य तौर पर इतने दिनों तक भोजन और पानी बंद रहने पर शरीर में बेचैनी के लक्षण दिखते हैं। लेकिन हरीश पिछले करीब 13 साल से गहरे कोमा में हैं, जिसकी वजह से उनमें कोई प्रतिक्रिया नहीं दिख रही है।” डॉक्टरों ने कहा कि यह प्रक्रिया ‘मृत्यु को तेज नहीं कर रही, बल्कि प्राकृतिक रूप से होने दे रही है’ और गरिमा बनाए रखने के लिए विशेष टीम गठित की गई थी। पूर्व AIIMS पलियेटिव विशेषज्ञों ने भी जोर दिया कि यह पैसिव इच्छामृत्यु नहीं बल्कि अनावश्यक लाइफ सपोर्ट हटाकर रोगी को प्राकृतिक मृत्यु का अधिकार देना है।

AIIMS प्रशासन ने पूरी प्रक्रिया कोर्ट के निर्देशानुसार और मेडिकल बोर्ड की निगरानी में पूरी की। परिवार को लगातार अपडेट और काउंसलिंग दी गई। परिवार का कहना है कि वे बेटे को अनावश्यक पीड़ा से मुक्त कराने के लिए यह फैसला ले चुके थे। यह मामला भारत में ‘गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार’ पर बहस को नई दिशा देगा। हरीश राणा की कहानी पर एक फिल्म बनाने की भी चर्चा है। परिवार अब अंतिम संस्कार की तैयारी में है।

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