गवई भावुक:सुप्रीम कोर्ट में महिला जज की नियुक्ति न कर पाने का अफसोस

Chief Justice News: भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) भूषण रामकृष्ण गवई ने शुक्रवार को अपने कार्यकाल के आखिरी कामकाजी दिन पर भावुक विदाई देते हुए एक गहरी उदासी जाहिर की। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में किसी महिला न्यायाधीश की नियुक्ति न कर पाना उनके लिए सबसे बड़ा अफसोस है। छह महीने के छोटे कार्यकाल के बावजूद, गवई ने उच्च न्यायालयों में महिलाओं को बढ़ावा देने पर जोर दिया, लेकिन शीर्ष अदालत में इसकी कमी को भी स्वीकार किया।

सुप्रीम कोर्ट की महिला वकीलों द्वारा आयोजित विदाई समारोह में बोलते हुए सीजेआई गवई ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “मुझे अफसोस है कि मैं सुप्रीम कोर्ट में किसी महिला सदस्य को नियुक्ति नहीं दिला सका।” उन्होंने तुरंत ही उच्च न्यायालयों (हाई कोर्ट्स) में अपनी कोलेजियम की सिफारिशों का जिक्र किया, जहां उन्होंने 16 महिला जजों की नियुक्ति की सिफारिश की, जिनमें सुप्रीम कोर्ट की वकील महिलाएं भी शामिल हैं।

“हमारी कोलेजियम हमेशा महिलाओं के व्यापक प्रतिनिधित्व पर विश्वास करती रही है,” उन्होंने जोड़ा। यह बयान सुप्रीम कोर्ट की महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जहां वर्तमान में केवल दो महिला जज हैं।

सीजेआई गवई का कार्यकाल 14 मई 2025 को शुरू हुआ था और 23 नवंबर को समाप्त हो जाएगा। वे भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश हैं, जो दलित समुदाय से दूसरे और बौद्ध धर्म के पहले सीजेआई हैं। अपने 40 वर्षों के न्यायिक सफर को याद करते हुए उन्होंने कहा, “1985 में जब मैं वकालत की दुनिया में कदम रखा, तो मैं कानून का छात्र था। आज पद छोड़ते हुए मैं न्याय का छात्र हूं।” उन्होंने संविधान के मूल्यों—समानता, न्याय, स्वतंत्रता और बंधुत्व—पर आधारित अपनी न्यायिक यात्रा को “पूरी संतुष्टि और कृतज्ञता” के साथ याद किया।

विदाई समारोह में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के कार्यक्रम में भी गवई ने अपनी भावनाएं बांटीं। उन्होंने एससीबीए द्वारा पूर्व महिला जज बेला त्रिवेदी के विदाई समारोह न आयोजित करने की आलोचना की थी, जिसे उन्होंने “खुलेआम निंदनीय” बताया था। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने गवई की नियुक्ति को “सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक” करार दिया, जबकि एससीबीए अध्यक्ष विकास सिंह ने उनकी सादगी की मिसाल दी। गवई ने पर्यावरण, आरक्षण और संवैधानिक मामलों में दिए गए अपने ऐतिहासिक फैसलों का भी जिक्र किया, जहां उन्होंने डॉ. बी.आर. अंबेडकर के मूल्यों को अपनाया।

यह अफसोस तब ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है जब सुप्रीम कोर्ट के 75 वर्षों के इतिहास में केवल 11 महिला जजों ने सेवा की है। गवई के कार्यकाल के मध्यावधि मूल्यांकन में भी कोलेजियम द्वारा महिला जजों की सिफारिश न करने पर सवाल उठे थे। उनके उत्तराधिकारी जस्टिस सूर्य कांत को उम्मीद है कि आने वाले समय में लैंगिक विविधता मजबूत होगी।

गवई का यह बयान न केवल न्यायपालिका में महिलाओं की भूमिका पर बहस छेड़ेगा, बल्कि भविष्य की नियुक्तियों के लिए एक चुनौती भी पेश करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा समावेशिता पर जोर दिया है, लेकिन शीर्ष पदों पर महिलाओं का अभाव अभी भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है।

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