कौन हैं हरीश राणा?
गाजियाबाद निवासी हरीश राणा 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। तब से वे स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में हैं, जिसमें उन्हें 100 प्रतिशत विकलांगता और क्वाड्रिप्लेजिया है। हरीश की आंखें झपकती हैं, लेकिन पिछले 13 वर्षों से उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।
माता-पिता की लंबी लड़ाई
हरीश की मां निर्मला राणा कहती हैं, “मैंने उसे 9 महीने गर्भ में रखा। अब मैं कह रही हूं कि उसे मुक्त करो। एक मां को यह कभी नहीं कहना चाहिए।” परिवार ने वर्षों तक बेटे की सेवा में अपना घर तक बेच दिया। जुलाई 2024 में परिवार ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसे अदालत ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चूंकि हरीश वेंटिलेटर पर नहीं हैं, इसलिए फीडिंग ट्यूब हटाना पैसिव नहीं बल्कि एक्टिव यूथेनेशिया होगा, जो भारत में अवैध है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने यह आदेश हरीश राणा के पिता अशोक राणा की याचिका पर दिया। कोर्ट ने 2018 के ‘Common Cause’ फैसले (जिसे 2023 में संशोधित किया गया था) के तहत ‘सम्मान से मरने के मौलिक अधिकार’ को मान्यता देते हुए यह निर्णय सुनाया। इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फीडिंग ट्यूब और नेसोगैस्ट्रिक ट्यूब ‘बेसिक केयर’ नहीं, बल्कि ‘मेडिकल ट्रीटमेंट’ हैं। इससे उन मरीजों के लिए भी लाइफ सपोर्ट वापस लेने का रास्ता खुल गया है जो वेंटिलेटर पर नहीं, लेकिन फीडिंग ट्यूब पर हैं।
AIIMS में होगी प्रक्रिया
कोर्ट ने कुछ विशेष दिशा-निर्देश भी जारी किए: हरीश को AIIMS नई दिल्ली के पैलिएटिव केयर विभाग में भर्ती किया जाएगा। वहां एक मेडिकल बोर्ड की निगरानी में धीरे-धीरे इलाज वापस लिया जाएगा। पूरी प्रक्रिया इस प्रकार होगी कि मरीज को तकलीफ न हो और उसकी गरिमा अंत तक बनी रहे।
क्या होता है पैसिव यूथेनेशिया?
पैसिव यूथेनेशिया का अर्थ है कि बीमार व्यक्ति को जीवित रखने वाला इलाज बंद कर दिया जाए, जैसे वेंटिलेटर, दवाइयां या अन्य जीवन-रक्षक उपकरण। इसमें डॉक्टर सक्रिय रूप से मौत नहीं देते, बल्कि बीमारी को अपना स्वाभाविक मार्ग लेने देते हैं। भारत में पैसिव यूथेनेशिया सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सख्त दिशा-निर्देशों के साथ अनुमत है।
क्यों है यह फैसला ऐतिहासिक?
2018 में ‘सम्मान से जीने के अधिकार’ को कानूनी मान्यता मिलने के बाद से यह पहला मामला है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने किसी टर्मिनली बीमार मरीज के लिए वास्तव में पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी है। यह फैसला न केवल हरीश राणा के परिवार के लिए, बल्कि भारत में ‘गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार’ की दिशा में एक नया अध्याय लिखता है।

