भाई विश्वजीत ने आरोप लगाया कि प्रशांत ने 2009 में मऊ CMO को धोखे में रखकर 40% नेत्र दिव्यांगता का फर्जी प्रमाण पत्र बनवाया, जो 50 साल से कम उम्र में संभव नहीं है। इसी आधार पर 2011 बैच में दिव्यांग कोटे से नौकरी हासिल की। विश्वजीत ने 2021 से कई बार शिकायत की—मऊ CMO, आजमगढ़ मेडिकल बोर्ड और राज्य दिव्यांगजन आयुक्त तक। प्रशांत कई बार जांच के लिए बुलाए गए, लेकिन हाजिर नहीं हुए। दिसंबर 2025 में कोर्ट आदेश का हवाला देकर आगे जांच टाली गई।
भाई को मिल रही धमकियां, परिवार से संवाद टूटा
28 जनवरी 2026 तक ताजा अपडेट में विश्वजीत को धमकियां मिलने की खबर आई है। आरोपों के सार्वजनिक होने के बाद परिवार से उनका संपर्क टूट गया है। विश्वजीत ने कहा कि प्रशांत जांच से बचने के लिए इस्तीफे का “नाटक” कर रहे हैं, क्योंकि नौकरी रहते तो प्रमाण पत्र निरस्त और रिकवरी होती।
प्रशांत की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी चर्चा में है। वे पहले सपा नेता अमर सिंह के करीबी रहे, राष्ट्रीय लोकमंच के मऊ जिलाध्यक्ष बने। 2022 में मऊ से BJP टिकट की दावेदारी की थी। विभाग ने इस्तीफे के बाद उन्हें मीडिया से बात करने पर रोक लगा दी है।
जांच जारी, कोई आधिकारिक कार्रवाई नहीं
मऊ के प्रभारी CMO डॉ. संजय गुप्ता ने बताया कि जांच चल रही है, लेकिन प्रशांत के सहयोग न करने से देरी हो रही है। कुछ पुरानी रिपोर्ट्स में आरोप गलत बताए गए थे, लेकिन नई शिकायतों से मामला फिर गरमा गया। राज्य कर विभाग ने इस्तीफे पर कोई टिप्पणी नहीं की। फिलहाल जांच जारी है और कोई अंतिम निर्णय नहीं आया।
यह विवाद यूपी प्रशासन में दिव्यांग कोटे की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहा है। देखना यह है कि जांच का क्या नतीजा निकलता है और इस्तीफा स्वीकार होता है या नहीं।

